Tuesday, October 24, 2006

पौत्री का बाबा से मिलन

{यह लेख कृष्णा - वीरेन्द्र न्यास के द्वारा लिखा गया है। श्री मितुल पटेल की टिप्पणी पर न्यास के द्वारा यह बताया गया है कि किसी को भी को इस लेख को बाटने, संशोधन करने अथवा वीकिपीडिया पर रखने की स्वतंत्रता है उन्हे अच्छा लगेगा यदि इसका श्रेय इस पोस्ट को या न्यास को दिया जाय}

न्यायमूर्ति एम.सी. देसाई
मुन्नीलाल चुन्नीलाल देसाई का जन्म १९०४ में नडिआड़ गुजरात में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा वहीं के स्कूल में और उच्च शिक्षा एलफिंस्टन विद्यालय बम्बई और बड़ौदा विश्वविद्यालय। उनके बडे भाई, महाराजा बड़ौदा से पैसा लेकर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढने के लिये गये और मुन्नीलाल को भी वहीं पर पढने के लिये बुला लिया।

मुन्नीलाल अपने बडे भाई की तरह भारतीय सिविल सेवा में बैठे और सफल रहे। १९२६ में उनकी नियुक्ति सहायक कलक्टर के रूप में उत्तर-प्रदेश में हो गयी। १९४१ मे जब वे कलक्टर के पद पर थे तो उन्हें अकारण वहां से स्थानान्तरित कर दिया गया। इसका कारण पूछने पर अंग्रेज आयुक्त ने बताया कि कि किसी बाहर के प्रदेश के हिन्दू व्यक्ति का उत्तर प्रदेश में कलक्टर के पद पर रहना ठीक नहीं है। इससे उन्हें लगा कि प्रशासनिक सेवा उनके लिये ठीक नहीं है और उन्होंने अपने आप को न्यायिक सेवाओं में स्थानान्तरित कराने के लिये विकल्प दे दिया। उस समय भारतीय सिविल सेवा के लोग न्यायिक सेवा में आ सकते थे। १९४२ में उनकी नियुक्ति अपर जनपद न्यायाधीश के रूप में हो गयी। यहीं से उनका न्यायिक सफर शुरू हुआ।

१३ दिसम्बर १९४८ को वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने और १७ फरवरी १९६१ को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने। वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सिविल सेवा से बनने वाले पहले मुख्य न्यायाधीश थे। न्यायमूर्ति देसाई की छवि एक ईमानदार तथा खरे जज के रूप में है। वे सख्त जज थे और फौजदारी के मुकदमे में सजा करने वाले जज के रूप में जाने जाते थे।

न्यायमूर्ति देसाई सार्वजनिक भाषण देने में शर्माते थे, इसलिये जब उन्होने मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला तो उनके स्वागत समारोह पर महाधिवक्ता कन्हैया लाल मिश्र ने कहा (१९६१ इलाहाबाद लॉ जरनल, जरनल भाग १८),
'My Lord, there has been on occasions a noticeable tendency on your Lordship's part to be shy of speech. I am afraid there would be occasions outside the Court when there would be repeated demands which are likely to wreck that silence. It is not merely an apprehension but a promise. But we are absolutely certain that in the coming years you and Mrs. Desai will continue in a larger field with a vaster influence the social charm that you have already been shedding over the life of Allahabad.'
श्री मिश्र कि यह भविष्यवाणी सच निकली। स्वतंत्रता के बाद के इलाहाबाद जीवन मे उन्होने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

न्यायमूर्ति देसाई पार्टियों और ताश के शौकीन रहे। ताश में ब्रिज और पोकर उनके प्रिय खेल थे। उनकी पत्नी कभी-कभी मजाक करती थी कि शायद ताश के प्रेम के कारण वे सर्वोच्च न्यायालय नहीं जा पाये। वे स्वयं भी ब्रिज के अच्छे खिलाडी थे। न्यायमूर्ति राम मनोहर सहाय ने अपनी जीवनी लिखी है इसमें वे बताते हैं,
'As a part of Republic Day celebrations, cricket match used to be held between the Bar and Bench. Once, when MC Desai, ICS was the Chief Justice it rained heavily. Therefore, it was decided that a bridge match be held between the bar and the bench. Sharmaji sent his car, got me picked and we played against the top table of MC Desai and V Bhargava. Both were ICS and retired as Chief Justices of the Court. They were very good players of bridge.' (A Lawyer's Journey published by Universal Law Publishing Company Delhi)

न्यायमूर्ति देसाई को मैदान में खेले जाने वाले खेल भी बेहद पसन्द थे। गोल्फ के शौकीन थे। गर्मी में हमेशा पहाड़ो पर रहना, हाईकिंग करना उन्हें पसन्द था। उनका प्रिय हिल स्टेशन डलहौज़ी था।

न्यायमूर्ति देसाई मेहमाननवाजी में विश्वास करते थे और मेहमानों को स्वयं परोसकर खिलाने में प्रसन्न रहते थे। सुख्खू उनका खानसामा था वह बचपन से ही न्यायमूर्ति देसाई के साथ आ गया था। वह खाना बहुत अच्छा बनाता था और अपनी मृत्यु तक, न्यायमूर्ति देसाई के साथ रहा। पार्टियों मे उसका हाथ बटाने निकेल्स नाम का एक और खानसामा आ जाता था।

न्यायमूर्ति देसाई बहुतों को जानते थे और उनकी खास बात यह थी कि वे सबको पहले नाम से पुकारते थे - आत्मीयता की इससे अच्छा क्या उदाहरण हो सकता है। अन्त समय में उनके आंख की रोशनी कम हो गयी, ठीक से दिखना बंद हो गया। इस कारण कई लोग उनसे मिलते समय अपना नाम बताते थे। उन्हें अच्छा नहीं लगता था क्योंकि वे सोचते थे कि वह व्यक्ति आंख की रोशनी कम होने के कारण सहानुभूति दिखा रहा है। वे हमेशा कहते थे कि उन्हें खुशी है कि आखों में कुछ रोशनी तो बाकी है। आंख की रोशनी कम हो जाने के बाद भी वे लोगों को उनकी आवाज से पहचान कर, उनके पहले नाम से ही बुलाते थे। अन्त समय में वे ताश आतशी शीशे की सहायता से देख कर खेलते थे।

वे शराब के भी शौकीन थे पर हमेशा दायरे के अन्दर। उनकी पार्टियों में, शराब पीने वाले और न पीने वालों का बराबर ध्यान रखा जाता था जो कि अक्सर आजकल की पार्टियों में नहीं होता है। यदि आप शराब नहीं पीते है और ऐसी पार्टी मे फंस जाये तो शामत ही समझिये, मालुम नही कब खाना मिले और बीच में तो सब ठन-ठन गोपाल। यह भी खास बात थी यदि आप शराब नहीं पीते थे तो तो उन्होंने इसका आदर किया कभी शराब पीने के लिये नहीं कहा।

न्यायमूर्ति राम मनोहर सहाय अपनी जीवनी में कहते हैं कि,
' Drinks in those days particularly when MC Desai was the Chief Justice was very common in dinners and parties. So much so that once when we had become better known, Jagdish Swaroop was astonished to find that KC Agrawal and I were moving in the Republic Day lunch without any glass. He told us that it was still not late to being taking drinks, otherwise he would never be Judges of the Court.' (A lawyer's journey: published by Universal law publishing company Delhi)
क्या मालुम, उस समय शायद जज़ बनने के लिये शराब का सेवन करना महत्वपूर्ण था। यह वाक्या तो सही होगा पर यह बात ठीक नहीं लगती। इलाहाबाद में बहुत से ऐसे लोग भी जज बने, जो शराब छूते भी नहीं थे। न्यायमूर्ति देसाई ने अधिकतर उन लोगों के नामों की सिफारिश की, जो शराब नहीं पीते थे।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय अपने में अनूठा है। सारे न्यायालयों मे इसका अपना क्लब है जिसमें हर शुक्रवार को आज उनकी पति या पत्नियां ही आ सकते हैं। इसके नियम इतने कठोर हैं कि इसमें उनके बच्चे भी नहीं जा सकते हैं। न्यायमूर्ति देसाई जब तक जीवित रहे, हर शुक्रवार को क्लब पहुंचना इनका नियम था। चार लोग मिल गये तो ब्रिज खेल लिया, नहीं तो मिल बैठ कर गपशप की।

न्यायमूर्ति देसाई को कभी इस बात का दुख नहीं हुआ कि उन्होने प्रशासनिक सेवा छोडकर न्यायिक सेवा अपनायी। उन्होने अपना २४ फरवरी १९६६ को मुख्य न्यायाधीश का पद छोडते समय कहा (१९६६ इलाहाबाद लॉ जरनल, जरनल भाग 5),
'I have never regretted the choice. How could I. The most exalted function with which a man can be entrusted is the administration of justice to his fellow being.

A Judge is not a servant, not even of the King; if he is a servant at all he is a servant of the law. A practical demonstration of the English doctrine is a story told by Prof. Goodhard of two Judges who went to Oxford on assize. They went to dinner at All Souls College where after the dinner the warden proposed the health of the Queen. The junior Judge who was new stood up and the senior pulled his coat and whispered, “Sit down you fool you are the Queen.'

वे किस तरह के जज थे उन्होने किस तरह का न्याय दिया, वे किस तरह की न्याय प्रणाली में विश्वास करते थे, इसका भी उन्होंने कुछ संकेत इसी अपने विदाई के भाषण में, यह किस्सा बता कर दिया,
In my judicial career I have followed the doctrine that a Judge's business is not to do justice but to administer law. ... [Let] the law prevail though justice may fall, is a good doctrine though it can be carried to the extreme as was done by a Maltese Judge. Malta is a small island with no room for more than one Judge. In the 18th Century there was a Judge Cambro who was in the habit of getting up early in the morning. One early morning when he was looking out from his window he saw a man being hotly chased by another. The victim was overtaken just under the window and stabbed with a knife. About that time a constable was to be seen in the distance and the assailant leaving the knife with the sheath in the wound ran away. Soon a baker came with his basket of bread and saw the victim lying dead. As he tried to remove the knife from the wound he saw a constable approaching from a distance. He got frightened and quickly stood up taking the blood stain sheath of the knife in his hand, put it into his basket and concealed himself beyond the entrance of a neighbouring house. All this was seen by Judge Cambo. The constable arrived there, found the victim dead and his body warm and still bleeding and informed that the murderer must be hiding somewhere in the neighbour hood. He made a search and promptly discovered the baker and interrogated him. Terror seized the baker and he lost his wits and gave incoherent and conflicting answers. His hands were stained with blood, the sheath in his basket fitted the knife that was found in the wound of the victim. He was found hiding himself near the scene of occurrence immediately after the murder. This circumstantial evidence was sufficient for conviction of anyone and in due course the baker was placed on trial before the Judge; there being no other Judge he had to try him. He found that the circumstantial evidence against the baker was so clinching that he could not but convict him. He brushed aside his personal knowledge that he was innocent and convicted him as required by the law and sentenced him to death. ... He [the Malta judge] had done justice according to law though he knew from personal knowledge that the baker was innocent. On similar evidence he would convict anyone and he had to convict the baker. I do not think my adoption of the doctrine would take me so far. I believe in the precept “do what you think right and do not worry about the consequences”.
इस किस्से की एक कड़ी और भी है जो कि न्यायमूर्ति देसाई ने अपने भाषण में न बता कर इसे दूसरी तरह से बतायी थी। मालटा के उस जज ने महारानी को एक पत्र लिखकर सही बात बतायी । इस पर महारानी ने उस baker की सज़ा माफ कर दी थी।

न्यायमूर्ति देसाई उत्तर प्रदेश के नहीं थे पर उन्हें इलाहाबाद से इतना प्रेम हो गया कि वे कभी छोडकर नहीं गये और ९० वर्ष की उम्र में फरवरी १९९४ में उन्होंने अपनी अंतिम यात्रा गंगा जी के लिये की। एक माह के अन्दर उनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गयी। न्यायमूर्ति देसाई के बारे में न्यायमूर्ति रवी स्वरूप धवन ने भी लिखा है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं।

किरन देसाई
किरन देसाई प्रसिद्ध लेखिका अनीता देसाई की पुत्री हैं, खुद भी अंग्रेजी के उपन्यास लिखती हैं। उन्होने दो उपन्यास लिखे हैं: Hullabalaoo in the Guava Orchard और The inheritance of loss. इस उपन्यास पर उन्हें वर्षं २००६ का बुकर पुरस्कार दिया गया है। इस पुरस्कार को जीतने वाली वे दुनियां की सबसे कम उम्र की महिला हो गयी हैं।

The inheritance of loss साई नामक लडकी की कहानी है, जो १५ वर्ष की उम्र में अनाथ हो जाती है और अपने बाबा जज़ जेमू भाई पटेल के साथ रहने के लिये कलिम्पोंग में आती है। किरण देसाई की नानी जर्मन थीं और नाना बंगाली। उनके मौसी कलिम्पोंग में रहती हैं, उन्होने कुछ समय वहां भी बिताया है। इसमें एक कथानक साई का है जिसमें उसका, एक नवयूवक ज्ञान के साथ, कच्ची उम्र का प्रेम होता है। दूसरा कथानक जज के खानसामें का है जिसका लड़का अमेरिका में है और खानसामा यह सोचता है कि उसका लड़का वहां बहुत अच्छा कर रहा है पर वास्तव में उसका लड़का अमेरिका में अवैध तरीके से रहा है।

यदि इस किताब के किसी भाग को किरन की आवाज में सुनना चाहें तो यहां सुन सकते हैं। यदि उनके बारे में न्यु-यॉर्क टाइम्स या बीबीसी में लिखे लेख को पढ़ना चाहें तो यहां और यहां पढ़ सकते हैं।

किरन देसाई के पिता अश्विन हैं और उनके पिता थे - न्यायमूर्ति मुन्नीलाल चुन्नीलाल देसाई भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश इलाहाबाद उच्च न्यायालय, इलाहाबाद।

The inheritance of loss – पौत्री, बाबा जज़, और खानसामा - पौत्री का बाबा से मिलन।

इस चिट्ठी में परिवार के सारे चित्र न्यायमूर्ति देसाई की पुत्री सुश्री लता के सौजन्य से हैं। पहले चित्र में न्यायमूर्ति देसाई अपने सारे परिवार के साथ - इसमें किरन नहीं हैं। वे उस समय पैदा नहीं हुई थीं। दूसरे चित्र में १३ साल की उम्र में किरन (बीच में), अपनी मां अनीता (बांये), और बड़ी बहन तानी (दायें) के साथ हैं।

3 comments:

mahashakti said...

आपका बहुत अच्‍छा लेख था, आपको इतने अच्‍छे लेख के लिये बधाई

सागर चन्द नाहर said...

बहुत सुन्दर और जानकारीपूर्ण लेख, यह पता नहीं था कि किरण देसाई, न्यायधीश श्री एम. सी. देसाई की पौत्री हैं।
साधूवाद!
इस तरह की और जानकारी का इन्तजार है।

mitul said...

आपकी जानकारी भरा लेख काफी अच्छा लगा। मुझे इन सारी बातो का बिल्कुल भी ज्ञान नही था। काफी अच्छा लगा यह जानकारी पाना। इस बात की खुशी है कि आप जैसे लोग हिंदी को इंटरनेट पर बढावा देने के लिए तत्पर है। आपको हिंदी विकिपीडिया के बारे मे जानकारी भी है। क्या आप इस लेख को, इस पर लगे चित्रो को और इस जैसे अन्य लेखो को हिंदी विकिपीडिया पर नही रखना चाहते? कृपया हिंदी विकिपीडिया पर भी आप यह जानकारी दें। वहाँ किरण देसाई के बारे लेख की शुरूआत हुई है। न्यायमूर्ति देसाई के लेख और उस लेख को आपस मे जोड सकते है। The inheritance of loss का लेख नही है, उसकी शुरूआत भी कर सकते है। इस एक दुसरे से जुडे लेख और समय के साथ उभरते लेखो की सुदंर श्रृंखला के लिए हम सभी आपके आभारी रहेगे।

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यह सेवा, न्यास द्वारा, हिन्दी देवनागरी (लिपि) को बढ़ावा देने के लिये शुरू की गयी है। मैं इसका सम्पादक हूं। आपके विचारों और सुझावों का स्वागत है। हम और भी बहुत कुछ करना चाहते हैं पर यह सब धीरे धीरे और इस पहले कदम की प्रतिक्रिया के बाद।