Sunday, September 23, 2007

सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्माः मिला तेज से तेज

सन् १९१७-१८ में क्रास्थवेट स्कूल का अपना एक विशेष स्थान था। स्त्री-शिक्षा के उन आरंभिक दिनों में उसका योगदान विशेष महत्व का था, तभी 'स्त्री-दर्पण' की सम्पादिका ने अपने पत्रिका में स्कूल की वार्षिक रिपोट के बारे में लिखते हुए बताया है कि कैसी-कैसी शिक्षित महिलाएं दूर-दूर से आकर वहां पढ़ाती हैं और
'इलाहाबाद और संयुक्तप्रान्त के सिवाय दूर-दूर देशों से भी जैसे क्वेटा, काश्मीर, लाहौर, जालन्धर, कलकत्ता, आरा, अजमेर, रतलाम, जावड़ा और उदयपुर से भी कन्याएं यहां के बोर्डिंग भवन में रहकर शिक्षा पाती हैं.... बोर्डिंग में रहने वाली बयासी हिन्दू और चौबीस मुसलमान लड़कियां हैं।'


इसी तरह की, दूर से (शायद इन्दौर से) आकर पढ़नेवाली एक लड़की से सुभद्रा की मित्रता हो गयी। यह लड़की आगे चलकर हिन्दी की एक प्रसिद्घ, शीर्ष-स्थानीय कवयित्री बनी--महादेवी वर्मा। सुभद्रा के बारे में लिखते हुए महादेवी लिखती हैं,
'सातवीं और पांचवीं कक्षा की विद्यार्थिनियों के सख्य को सुभद्रा जी के सरल स्नेह ने ऎसी अमिट लक्ष्मण-रेखा से घेरकर सुरक्षित रखा कि समय उस पर कोई रेखा नहीं खींच सका।'

...

मां और महादेवी जी का संबंध भी ऎसी ही गहरी आत्मीयता का सम्बन्ध था। उसका आरम्भ तो क्रास्थवेट स्कूल से हुआ था, लेकिन तब कोई नहीं जानता था कि आगे चलकर जीवन में कौन क्या राह पकड़ेगा। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए महादेवी जी क्रास्थवेट स्कूल में मां के साथ बिताये दिनों के बारें में लिखती हैं, "एक सांतवी कक्षी की विद्यार्थिनी, एक पांचवी कक्षी की विद्यार्थिनी से प्रश्न करती है 'क्या तुम कविता लिखती हो ?' दूसरी ने सिर हिलाकर ऎसी अस्वीकृति दी जिसमें हां और नहीं तरल होकर एक हो गये थे। प्रश्न करने वाली ने इस स्वीकृति-अस्वीकृति की संधि से खीजकर कहा, 'तुम्हारी क्लास की लड़कियां तो कहती हैं कि तुम गणित की कापी तक में कविता लिखती हो। दिखाओ अपनी कापी, और उत्तर की प्रतीक्षा में समय नष्ट न कर वह कविता लिखने की अपराधिनी को हाथ पकड़कर खींचती हुयी उसके कमरे में डेस्क के पास ले गयी। नित्य व्यवहार में आने वाली गणित की कापी को छिपाना संभव नहीं था, अत: उसके साथ अंकों के बीच में अनधिकार सिकुड़कर बैठी हुई तुकबन्दियां अनायास पकड़ में आ गयीं। इतना दंड ही पर्याप्त था। पर इससे संतुष्ट न होकर अपराध की अन्वेषिका ने एक हाथ में वह चित्र-विचित्र कापी थामी और दूसरे में अभियुक्ता की उंगलियां कसकर पकड़ी और वह कर कमरे में जा-जाकर इस अपराध की सार्वजनिक घोषणा करने लगी।" लेकिन आठवीं क्लास पास करने के बाद मां की शादी हो गयी, पढ़ाई छूट गयी। उनकी राजनीति सक्रिय राजनीति रही। उनकी कविता उनके जीवन से बहुत ही सीधे रूप में जुड़ी रही।

महादेवी जी की शिक्षा निर्बाध चली और सम्मानपूर्वक शिक्षा समाप्त करके उन्होंने स्त्री-शिक्षा को अपना कार्य क्षेत्र बनाया। उनकी कविता उनके व्यक्तित्व के अनुरूप अन्तर्मुखी और अर्थगाम्भीर्यमयी थी। उन्होंने साहित्य में बहुत यश कमाया; परन्तु इन दोनों के व्यक्तित्वों के अन्तर से या उनकी जीवनधाराओं के अलग-अलग होने से दोनों के उस पुराने साहचर्य में कभी कोई अन्तर नहीं आया। बहुत बार कई-कई वर्षों बाद उनका मिलन होता था पर वह दो साहित्यिकों का मिलन नहीं होता था, दो सहेलियां आपस में मिलती थीं और उसी तरह के हंसी-मजाक होते थे। गम्भीर बातों को छोड़कर दुनिया भर की और सब बातें होती थीं। दोनों खादी भण्डार में दो एक-सी साड़ियां खोजती थीं, जिनका मिलना उन दिनों, जब खादी का प्रचार इतना कम था, जरा मुश्किल होता था। पर यिद कभी एक-सी दो साड़ियां मिल जाती थीं तो उन्हें संभालकर रखा जाता था कि उन्हें साथ-साथ पहनकर बाहर जा सकें। मां जब भी कभी कहीं जायें और रास्तें में इलाहाबाद पड़ता हो तो वे एक दिनल वहां जरूर रूकतीं। अगर कभी किसी कारण से इलाहाबाद न उतर सकती हों तो महादेवी जी को स्टेशन पर बुला लेतीं।

एक बार महादेवी जी किसी साहित्यिक आयोजन में जबलपुर आयीं। उनके ठहराने की व्यवस्था किसी बड़े आदमी के घर की गयी थी, लेकिन उन्होंने मां के साथ उनके टूटे-फूटे घर में ही ठहरना पसन्द किया। सबेरे मां ने उनसे कहा,
'महादेवी, तुम जरा बैठो, मैं आंगन लीप लूं तब फिर तुम्हारे साथ बैठूंगी।'
महादेवी ने कहा,
'तुम क्या समझती हो, मुझे लीपना नहीं आता बहुत अच्छा लीपना जानती हूं।' मां बोलीं, 'तुम जानती होगी पर मेरे समान जल्दी नहीं लीप पाओगी।'
महादेवी इस बात को क्यों मानती, बोलीं,
'अच्छी बात है, मैं एक तरफ से लीपना शुरू करती हूं और तुम दूसरी तरफ से। देखें कौन जल्दी लीपता है और अच्छा लीपता है।'
और दोनों ने आंगन के दो विपरीत कोनों से लीपना शुरू किया।

जबलपुर के साहित्यिकों और साहित्य-प्रेमियों ने सुना कि हमारे शहर में प्रसिद्घ कवयित्री महादेवी वर्मा पधारी हैं और सुभद्रा जी के घर ठहरी हैं। सबेरे-सबेरे सब लोगों ने दल बनाकर वहां धावा बोल दिया और जब हमारे घर पहुंचे तो देखा कि दोनों कवयित्रियां पूरे मनोयोग से आंगन लीपने में जुटी हुयी हैं।

ऎसे ही मां एक बार शाम को इलाहाबाद में महादेवीजी के घर पहुंची। उन्होंने तांगे पर से अपना सामान नहीं उतरवाया और महादेवीजी को बुलाकर उनसे कहा कि '
देखो, इस बार मैं तुम्हारे घर पर नहीं ठहरूंगी',
और इलाहाबाद के एक अध्यापक कवि का नाम लेकर बोलीं कि '
उनका बहुत आग्रह है, मैं एक बार उनके साथ ठहरूं तो इस बार मैं वहं जाऊंगी। चलो तुम भी मेरे साथ चलो, फिर लौट आना।'
महादेवी जी बोलीं कि '
अच्छा, चलो मैं भी चलती हूं। सुना है उनकी पत्नी बहुत बढ़िया कचौरी बनाती हैं। अच्छा है, आज कचौरियां खायें।'

तांगे में बैठकर दोनों उन कवि महोदय के घर पहुंचीं। दरवाजा खटखटाया गया परन्तु दरवाजा खुलने के पहले ही उन महाशय की पत्नी ने इस तरह के बिन बुलाये मेहमानों के लिए अपने पति को लताड़ना शुरू किया और जोरदार शब्दों में बता दिया कि वे दुनिया भर के लिए खाना नहीं पका सकती हैं। लोगों ने समझ क्या रखा है, मुंह उठाया और चले आये। पतिदेव अपनी पत्नी का क्रोध शान्त करने में लगे थे, पर इन दोनों सहेलियों ने इस बीच चुपचाप प्रत्यावर्तन में ही कल्याण समझा और घर में कचौरी न सही, जो भी गरम-गरम भोजन मिला, उसे में तृप्ति पायी।


मिला तेज से तेज
सुभद्रा कुमारी चौहान -बचपन, विवाह।। जबलपुर आगमन, मुश्कलें, और रचनायें।। जीवन की कुछ घटनायें।। महादेवी वर्मा।।

(सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी, इनकी पुत्री, सुधा चौहान ने 'मिला तेज से तेज' नामक पुस्तक में लिखी है। हम इसी पुस्तक के कुछ अंश, हंस प्रकाशन के सौजन्य से प्रकाशित कर रहें हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान की सारी रचनायें 'सुभद्रा समग्र' में हैं।

इन दोनो पुस्तकों को हंस प्रकाशन १८, न्याय मार्ग, इलाहाबाद दूरभाष २४२३०४ ने प्रकाशित किया है। 'मिला तेज से तेज' पुस्तक के पेपरबैक प्रकाशन का मूल्य ८० रूपये और हार्ड कवर का मूल्य १६० रूपये है। 'सुभद्रा समग्र' पुस्तक के हार्ड कवर का मूल्य ३५० रुपये है। इन दोनो पुस्तकों को आप हंस प्रकाशन से पोस्ट के द्वारा मंगवा सकते हैं।)

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