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Monday, May 04, 2009

विष्णु प्रभाकर - अपनो के बीच

स्वर्गीय श्री विष्णु प्रभाकर हिन्दी के जाने माने साहित्यकार थे। उनकी मृत्यु दिनांक १२ अप्रैल २००९ को हो गयी। हमारे लिये यह लेख, उनकी सलहज श्रीमती उषा मांगलिक ने लिखा है।

श्रद्घेय विष्णुप्रभाकर जी हिन्दी जगत के एक अमर व कीर्तिमान शिल्पी थे। अपनी रचनाओं के रूप में, उन्होंने हिन्दी को जो सम्पदा दी है हिन्दी जगत उसके लिए उनका सदा ऋणी रहेगा।

यह चित्र सन १९७२ में लिया गया था। लेखिका इस चित्र में सबसे दाहिने तरफ खड़ी है। उसके बाद दाहिने से बाई ओर लेखिका के पति स्वर्गीय श्री दया मित्र माँगलिक व माँगलिक के पिता स्वर्गीय श्री विषन स्वरूप तथा नन्दोई स्वर्गीय श्री विष्णु प्रभाकर बाई तरफ हैं। एवं नीचे बैठे दो व्यक्ति दांये से बांये मनोज मांगलिक व अभय माँगलिक हैं।

सार्वजनिक जीवन से हट कर परिवार व स्वजनों के बीच उनका एक अलग व्यक्तित्व था । उनको स्मरण करते हुए मैं आज उसी की चर्चा करना चाहूंगी।

प्रभाकर जी मेरे नन्दोई थे। अत: मेरे लिए वे सदा जीजाजी अथवा भाईसाहब ही रहे। आयु में वे मुझसे काफी बड़े थे। लेकिन मेरे और उनके बीच जो नाता था, उसके चलते हमलोग थोड़ी ठिठोली कर लेते थे। सबसे सुन्दर ठिठोली मेरी पोती आनन्दिता [लेखिका की पोती] ने की। लगभग आठ वर्ष पहले वे हमारे पास आये थे। उस समय आनन्दिता ४/५ साल की थी। एक दिन उसने उनसे पूछा
'बाबा आपका नाम क्या है'

लेखिका के छोटे पुत्र मनोज मांगलिक और उसकी पत्नी को आशिर्वाद देते हुऐ

उन्होने अपना विष्णु प्रभाकर बताया। शायद उस नामका उच्चारण करना, आनन्दिता के लिए शायद कठिन था। कुछ देर सोचने के बाद बोली,
'हमने आपका नाम पप्पू रख दिया है। हम आपको पप्पू बाबा कहेगें।'
इस पर प्रभाकर जी खूब हंसे और बोले,
'बुढापे में ही सही कोई तो मुझे पप्पू कहेगा।'
उस दिन से वे हमारे घर में 'पप्पू बाबा' ही बने रहे।

इलाहाबाद में फरवरी माह में अखिल भारतीय नाटक समारोह एक पुरानी परम्परा है। एक बार प्रभाकर जी इसके निर्णायक बन कर आये थे पर रहे हमारे साथ में ही। उस समय मुझे बहुत खांसी हो रही थे। रात में अधिक परेशान करती थी। रात खांसते-खांसते बैठे-बैठे बीतती थी। वे, रात को लगभग १२ बजे, प्रयाग संगीत समिति से आये। मुझे खांसते देख मेरी ननद से कहा,
'उषा को पहले गरम पानी फिर चाय बना कर पिलाओ।'
वे स्वयं मेरे पास बैठ मेरी कमर सहलाते रहे। अगले दिन मेरे पति से कहा,
'तुम्हारा पहला काम है उषा को डाक्टर के पास ले जाओ।'
यह थी उनकी सहृदयता अपनत्व और स्नेह की ऊष्मा।

जब वे 'आवारा मसीहा' लिख रहे थे तब लिखने के लिए हमारे पास बहुत बार आ कर रहे। क्योंकि दिल्ली में, उन्हें लिखने में व्यवधान होता था। उस समय हमे विशेष हिदायत थी कि हम किसी को यह नहीं बतायेंगे कि वे इलाहाबाद में है। उस समय उनकी नियमित दिनचर्या रहती थी। सबेरे एक घंटा टहल कर आते थे और शाम के समय एक घन्टा हम सबके साथ बातचीत करते थे। बाकी समय अपने लेखन में व्यस्त रहते थे। दिल्ली वापस जाने के ३/४ दिन पहले ही उनके लेखन में व्यतिक्रम होता था। तब वे अपने मित्रों और इलाहाबाद के साहित्यकारों से मिलने जाते थे। उस समय, उन्हें सबसे मिलाने ले जाने का सौभाग्य, मुझे ही मिलता था। वे स्वयं कहते थे,
'दयामित्र (मेरे पति) को अपना काम करने दो, तुम्हारे साथ चलते हैं।'

उनके साथ मुझे इलाहाबाद के लगभग सभी साहित्यकारों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ—राम कुमार वर्मा, महादेवी वर्मा, इलाचन्द्र जोशी, अमृतराय आदि।

एक बार प्रभाकर जी, हिन्दी साहित्य सम्मेलन में भाग लेने इलाहाबाद आये। उस समय भी, सम्मेलन के कार्यक्रमों में सम्मिलित होने के लिए मैं ही उनके साथ रहती थी। अपने मित्रों से वे मेरा परिचय अलग अलग रूप में देते थे किसी से कहते
'इनसे मिलिए उषा मांगलिक, ये मेरी सेक्रेट्री हैं'
किसी से कहते,
'ये मेरी सलहज हैं'
किसी से कहते
'ये मेरे साले की पत्नी हैं'
और किसी से कहते
'ये मेरी ड्राइवर है।'
उनके इसी विनोदी स्वभाव के चलते, घर में बड़ा मधुर वातावरण बना रहता था।

मैं हमेशा से थोड़ा बहुत लिखती रही हूँ। कभी फुरसत में बैठे सब गप-शप कर रहे होते तो अनायास ही कहते,
'लाओ दिखाओ, क्या लिखा है'
पढ़कर कहते,
'कहाँ से नकल उतारी है। कहाँ से टीपा है।'

मै नाराज होकर कहती,
'जीजाजी, आप मेरा अपमान कर रहे है।'
वो कहते,
'भई इसे तुम अपमान समझो तो समझो - और यदि प्रशन्सा समझो तो बहुत बड़ी प्रशन्सा है। पढ़कर लगा- किसी मंजे हुए लेखक ने लिखी है। यदि तुमने लिखी है तो वास्तव में सराहनीय है।'
मेरी कई कहानियाँ उन्होने समाज कल्याण पत्रिका में प्रकाशित करवाई है। वे हमेशा कहते,
'लिखा करो। बहुत अच्छा लिख सकती हो। तुम तो बस दाल-रोटी चाय-पानी में लगी रहती हो या डन्डा लेकर अपने बच्चों के पीछे पड़ी रहती हो- पढो,पढो।'
मै कहती,
'अच्छा। जीजाजी यदि मैं लिखती रहूँ और दाल-रोटी व चाय-पानी बनाना भूल जाऊँ तो आप कल को ही दिल्ली भागते नजर आओगे।'
इस पर वे हँसते हुए कहते,
'तुम्हारे दाल-रोटी बनाते हुए भी भाग सकता हूँ। तुम्हारी जीजी की याद आई और मैं भागा।'

एक बार बिहार सरकार ने, उन्हें हिन्दी के वरिष्ठ लेखक के रूप में पुरस्कृत किया। पुरस्कार ले कर लौटते समय वे कुछ दिन हमारे पास रहे। पुरस्कार में सरस्वती प्रतिमा और कुछ धनराशि थी। हम लोगों ने विशेषकर मैंने उनसे ठिठोली की,
'जीजाजी इसमे हमारा भी हिस्सा होना चाहिए। कम से कम दस प्रतिशत तो मिलना ही चाहिए'
वे हँसकर बोले,
'तुम व्यापारी की पत्नी हो। तुम्हे प्रतिशत ज्यादा याद रहता है।'
मैंने कहा,-
'व्यापारियों से ज्यादा अधिकारियों को याद रहता है जीजाजी। सत्य तो यह है कि प्रतिशत उन्ही का अधिकार है।'
उन्हें यह पुरस्कार राबड़ी देवी ने दिया था। ठिठोली करते बोले,
'देखो कितनी बड़ी विडम्बना है। एक वरिष्ठ साहित्यकार को पुरस्कृत किया है एक निरक्षर-अनपढ़ नारी ने। जिसने मेरी एक कृति भी नही पढ़ी या सुनी होगी।'
प्रभाकर जीजा, हमारे पास बहुत बार आए हैं। मेरे तीनों बेटों के विवाह-समारोह में, दुख-सुख के भी अनेक अवसरों पर आकर
परिवार के एक सदस्य के समान रहे और सम्मिलित हुए हैं।

लेखिका बड़े पुत्र राज मंगलिक को आशिर्वाद देते हुऐ

हम लोग भी अक्सर दिल्ली जाते थे। मैं ही उनके पास अधिक दिन रहती थी। मेरे पति तो दो-चार दिन बाद ही वापस आ जाते थे। कुछ दिन और रूकने का सदा आग्रह करते थे। इधर अन्तिम वर्षों में मैं उनसे मिलने जल्दी जल्दी जाने लगी थी । अपने पति की मृत्यु के बाद जीजाजी की बीमारी और गिरते स्वास्थ के कारण-मेरा जाना अनिवार्य सा हो गया था।

३ फरवरी २००९ को मैं अन्तिम बार उनसे मलने गई। उस समय वे काफी कष्ट में थे। लेकिन चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। बल्कि एक अपूर्व ओज से चेहरा चमक रहा था। पूछने पर इतना ही कहा,
'दर्द तो बहुत है पर उपाय कुछ नहीं है।'
एक एक कर बातें बहुत की। पुरानी बातें, घटनाएं याद करते रहे। बीच-बीच में गफलत में आ जाते थे- (थक जाते होगें) अपने बेटे अतुल से कहा,
'मेरी फाइल निकालो। उषा मेरी कहानियाँ लिखेगी। मै बोलूगां।'
अतुल ने कहा,
'अभी आप मामीजी से बातें करिए। बाद में वे आपकी सभी कहानियाँ लिख देगी।'
मृत्यु से पहले वे अपनी आत्मकथा का चौथा भाग लिख रहे थे, जो अधूरा ही रह गया।

चलते समय मैं और मेरे पति उनके चरण छू कर प्रणाम करते थे और आशीर्वाद मांगते थे। इस बार चरण छूने का प्रश्न नहीं था। क्योंकि हिन्दुओं में लेटे हुए व्यक्ति के चरण नहीं छुए जाते और जीजाजी बैठ नहीं सकते थे। हाथ जोड़ कर जब उन्हें प्रणाम करने लगी तब उन्होनें मेरे जुड़े हाथ पकड़ लिए और बोले,
'इस बार उषा तुम मुझे आशीर्वाद देकर जाओ। मेरी मुक्ति का आशीर्वाद।'
मेरा मन और गला दोनों भर आए। कुछ क्षण अपने को संभाल कर बोली,
'आपको आशीर्वाद दे सकूं वह शक्ति मेरे पास कहाँ है जीजाजी पर उस सर्वशक्तिमान से प्रार्थना अवश्य करूंगी कि वह आपको कष्टों से मुक्ति दे।'

वही उनके अन्तिम दर्शन थे जो मेरे मानस पटल पर सदा सजीव रहेंगे।

Sunday, October 14, 2007

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला और सुभद्रा कुमारी चौहान

इलाहाबाद में महादेवी जी के घर मां का परिचय सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला से हुआ था। निराला तब अपनी प्रतिभा से उद्भासित दिग्गज कवि थे और मां तब तक गृहस्थी के चक्कर में फंसी हुयी अपने बच्चों की मां थीं, जो अपने घर और देश सब की चिन्ताओं को अपने ऊपर ओढ़े हुए साहित्य के राजमार्ग को छोड़कर उसकी पगडंडी पर चलने वाली एक साधारण बटोही रह गयी थीं। लेकिन वह परिचय दो साहित्यिकों या दो कवियों का न होकर दो व्यक्तियों का था, जिनमें से एक स्त्री थी, जिसका सहज मातृत्व किसी को भी मां की ममता और बहन का स्नेह दे सकता था। मां ने अपने सामने बैठे हुए उस लम्बे-चौड़े विशालकाय पुरूष के अन्दर छिपे हुए शिशु को पहचान लिया था, जो इसी स्नेह के लिए तरसा हुआ है।

निराला जी का यह चित्र रचनाकार पत्रिका की चिट्ठी 'निराला एवं उनकी परवर्ती कविता में मुक्तिगान' से लिया गया है और इसी के सौजन्य से है।

मुझे सन् ठीक से याद नहीं है, ४३ या ४४ रहा होगा। जबलपुर की किसी साहित्यिक संस्था ने निराला जी को जबलपुर आमंत्रित किया था। उसका सब पत्रव्यवहार मां ने किया था। उन्होंने ही इसका भी इन्तजाम किया था कि जब निराला जी जबलपुर आयें, तो उन्हें पांच सौ रूपये की थैली देकर उनका सम्मान किया जाय। होली के आस-पास का समय था, जब निराला जी जबलपुर आये। उनके ठहरने का प्रबन्ध हमारे पड़ोसी एक साहित्य-प्रेमी धनी व्यक्ति के यहां किया गया था। उन दिनों निराला जी के मन का सन्तुलन जरा बिगड़ा हुआ था। वे जबलपुर शाम के समय पहुंचे। नहा-धोकर गीले बदन ही वे केवल एक धोती पहनकर कमरे में आ गये। कमरा आदमियों से भरा था और उसमें पूरी तेजी से पंखा चल रहा था। पंखे के नीचे निराला जी ठण्ड से झुरझुराते बैठे रहे। न तो उन्हें ही सूझा और न किसी और को उनसे यह कहने की हिम्मत पड़ी कि आप बदन पोंछकर कुछ पहन लीजिए। मां जब घर आयीं, तो बताने लगीं कि बेचारे निराला जी ठण्ड से कंपकंपाते बैठे रहे पर बदन पर कुछ डाल लें, यह उन्हें नहीं सूझा। उन्हें तो किसी ऎसी स्त्री की जरूरत है, जो मां-बहन के समान उनकी जरूरतों को समझकर उनकी फिकर रख सके। एक तो निराला जी का लम्बा-चौड़ा भव्य व्यक्तित्व, दूसरे उनकी कुछ असन्तुलित मन:स्थिति, इन सब से शायद मां भी हिचक गयी होंगी, वर्ना उनका जैसा उन्मुक्त और स्नेही स्वभाव था वे पहले निराला जी को तौलिया देतीं कि 'लो, इससे बपना बदन पोंछ लो' और फिर कुर्ता पहनने को दे देतीं।

निराला जी अपने इस प्रवास में दो-तीन बार हमारे घर आये। काका तब तब जेल में थे। बैठने के कमरे में पूरे फर्श पर गद्दा बिछा हुआ था। निराला जी को वहां बिठाकर मां चौके में खाने का इन्तजाम करने गयीं। निराला जी ने अलमारी खोलकर उसमें से चुन-चुनकर अपनी पुस्तकें निकाल लीं और लेटकर पढ़ने लगे। पढ़ते-पढ़ते खुश होकर निराला जी कमरे के एक सिरे से दूसरे सिरे तक लोट लगाते। इतने बड़े कवि और ऎसे भव्य व्यक्तित्व वाले आदमी से हम भाई-बहन यों ही आतंकित थे, उन्हें इस तरह की चेष्टाएं करते देखकर हम सब सहमे हुए दूसरे कमरे से झांक-झांककर देखते रहे। निराला जी की वह खुशी एक बच्चे जैसी खुशी थी, जिसे अपना कोई काम बहुत अच्छा लगा हो। वह और कुछ भी नहीं था क्योंकि मां जब वापस कमरे में आयीं तो उनसे वे ठीक से बात करने लगे। पर यह भी ठीक है कि वे अनर्गल बातें भी करते थे। पता नहीं यह कैसी ग्रन्थि थी पर जब बहुत से लोग उनसे मिलने आ जाते तो वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर और जवाहरलाल नेहरू के परिवार से नीचे कोई और बात नहीं करते थे। बड़े दुख की बात है कि निराला जी के मन की इस ग्रन्थि को सद्भावना-पूर्वक समझकर उसका उपचार करने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया। इसी प्रसंग में मुझे बपने अनुभव की एक-दो घटनाएं याद आती हैं, जिनसे इस बात पर रोशनी पड़ती है कि यदि उन्हें केवल निन्दा या केवल स्तुति का पात्र न बनाकर एक सहज मानवीय धरातल पर उनको समझने का यत्न किया गया होता तो उनकी बहुचर्चित विक्षिप्तता की व्याधि का समाधान खोज लेना बहुत कठिन न होता।
...
फिर शायद सन् १९४७ में काशी विश्वविद्यालय में निराला जी की स्वर्ण जयन्ती मनायी गयी। उसमें मां भी आमंत्रित थीं। एक तो मां निराला जी को बहुत मानती थीं, दूसरे मैं बनारस में ही रहती थी। ...

विश्वविद्यालय के आयोजन से लौटकर मां ने उस के बारे में मुझको बताया कि किस तरह निराला का सम्मान किया गया। लोगों ने उन्हें रेशम का कुर्ता, जरी के काम का उत्तरीय और बढ़िया महीन धोती पहनाकर बिलकुल दूल्हा बना दिया। फिर कुछ सोचकर बोलीं कि 'हो सकता है दूसरे ही दिन निराला जी सब कुछ उतारकर किसी को दे दें। इससे तो अच्छा होता कि उन्हें चार जोड़ी सादे कपड़े बनवा देते, जो कुछ दिन उनके काम तो आते।' उसके दूसरे दिन हम लोगों ने निराला जी को सड़क पर से जाते देखा। उनके वे कपड़े जब से पहने गये थे शायद बदन से उतरे नहीं थे। सारे कपड़ों में सलवटें पड़ी थीं, बाल उलझे से थे। पैर की चप्पल पहनना वे शायद भूल ही गये। आसपास से बेखबर कहीं चले जा रहे थे।

मिला तेज से तेज
सुभद्रा कुमारी चौहान -बचपन, विवाह।। जबलपुर आगमन, मुश्कलें, और रचनायें।। जीवन की कुछ घटनायें।। महादेवी वर्मा।। सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला।।

(सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी, इनकी पुत्री, सुधा चौहान ने 'मिला तेज से तेज' नामक पुस्तक में लिखी है। हम इसी पुस्तक के कुछ अंश, हंस प्रकाशन के सौजन्य से प्रकाशित कर रहें हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान की सारी रचनायें 'सुभद्रा समग्र' में हैं।

इन दोनो पुस्तकों को हंस प्रकाशन १८, न्याय मार्ग, इलाहाबाद दूरभाष २४२३०४ ने प्रकाशित किया है। 'मिला तेज से तेज' पुस्तक के पेपरबैक प्रकाशन का मूल्य ८० रूपये और हार्ड कवर का मूल्य १६० रूपये है। 'सुभद्रा समग्र' पुस्तक के हार्ड कवर का मूल्य ३५० रुपये है। इन दोनो पुस्तकों को आप हंस प्रकाशन से पोस्ट के द्वारा मंगवा सकते हैं।)

Sunday, September 23, 2007

सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्माः मिला तेज से तेज

सन् १९१७-१८ में क्रास्थवेट स्कूल का अपना एक विशेष स्थान था। स्त्री-शिक्षा के उन आरंभिक दिनों में उसका योगदान विशेष महत्व का था, तभी 'स्त्री-दर्पण' की सम्पादिका ने अपने पत्रिका में स्कूल की वार्षिक रिपोट के बारे में लिखते हुए बताया है कि कैसी-कैसी शिक्षित महिलाएं दूर-दूर से आकर वहां पढ़ाती हैं और
'इलाहाबाद और संयुक्तप्रान्त के सिवाय दूर-दूर देशों से भी जैसे क्वेटा, काश्मीर, लाहौर, जालन्धर, कलकत्ता, आरा, अजमेर, रतलाम, जावड़ा और उदयपुर से भी कन्याएं यहां के बोर्डिंग भवन में रहकर शिक्षा पाती हैं.... बोर्डिंग में रहने वाली बयासी हिन्दू और चौबीस मुसलमान लड़कियां हैं।'


इसी तरह की, दूर से (शायद इन्दौर से) आकर पढ़नेवाली एक लड़की से सुभद्रा की मित्रता हो गयी। यह लड़की आगे चलकर हिन्दी की एक प्रसिद्घ, शीर्ष-स्थानीय कवयित्री बनी--महादेवी वर्मा। सुभद्रा के बारे में लिखते हुए महादेवी लिखती हैं,
'सातवीं और पांचवीं कक्षा की विद्यार्थिनियों के सख्य को सुभद्रा जी के सरल स्नेह ने ऎसी अमिट लक्ष्मण-रेखा से घेरकर सुरक्षित रखा कि समय उस पर कोई रेखा नहीं खींच सका।'

...

मां और महादेवी जी का संबंध भी ऎसी ही गहरी आत्मीयता का सम्बन्ध था। उसका आरम्भ तो क्रास्थवेट स्कूल से हुआ था, लेकिन तब कोई नहीं जानता था कि आगे चलकर जीवन में कौन क्या राह पकड़ेगा। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए महादेवी जी क्रास्थवेट स्कूल में मां के साथ बिताये दिनों के बारें में लिखती हैं, "एक सांतवी कक्षी की विद्यार्थिनी, एक पांचवी कक्षी की विद्यार्थिनी से प्रश्न करती है 'क्या तुम कविता लिखती हो ?' दूसरी ने सिर हिलाकर ऎसी अस्वीकृति दी जिसमें हां और नहीं तरल होकर एक हो गये थे। प्रश्न करने वाली ने इस स्वीकृति-अस्वीकृति की संधि से खीजकर कहा, 'तुम्हारी क्लास की लड़कियां तो कहती हैं कि तुम गणित की कापी तक में कविता लिखती हो। दिखाओ अपनी कापी, और उत्तर की प्रतीक्षा में समय नष्ट न कर वह कविता लिखने की अपराधिनी को हाथ पकड़कर खींचती हुयी उसके कमरे में डेस्क के पास ले गयी। नित्य व्यवहार में आने वाली गणित की कापी को छिपाना संभव नहीं था, अत: उसके साथ अंकों के बीच में अनधिकार सिकुड़कर बैठी हुई तुकबन्दियां अनायास पकड़ में आ गयीं। इतना दंड ही पर्याप्त था। पर इससे संतुष्ट न होकर अपराध की अन्वेषिका ने एक हाथ में वह चित्र-विचित्र कापी थामी और दूसरे में अभियुक्ता की उंगलियां कसकर पकड़ी और वह कर कमरे में जा-जाकर इस अपराध की सार्वजनिक घोषणा करने लगी।" लेकिन आठवीं क्लास पास करने के बाद मां की शादी हो गयी, पढ़ाई छूट गयी। उनकी राजनीति सक्रिय राजनीति रही। उनकी कविता उनके जीवन से बहुत ही सीधे रूप में जुड़ी रही।

महादेवी जी की शिक्षा निर्बाध चली और सम्मानपूर्वक शिक्षा समाप्त करके उन्होंने स्त्री-शिक्षा को अपना कार्य क्षेत्र बनाया। उनकी कविता उनके व्यक्तित्व के अनुरूप अन्तर्मुखी और अर्थगाम्भीर्यमयी थी। उन्होंने साहित्य में बहुत यश कमाया; परन्तु इन दोनों के व्यक्तित्वों के अन्तर से या उनकी जीवनधाराओं के अलग-अलग होने से दोनों के उस पुराने साहचर्य में कभी कोई अन्तर नहीं आया। बहुत बार कई-कई वर्षों बाद उनका मिलन होता था पर वह दो साहित्यिकों का मिलन नहीं होता था, दो सहेलियां आपस में मिलती थीं और उसी तरह के हंसी-मजाक होते थे। गम्भीर बातों को छोड़कर दुनिया भर की और सब बातें होती थीं। दोनों खादी भण्डार में दो एक-सी साड़ियां खोजती थीं, जिनका मिलना उन दिनों, जब खादी का प्रचार इतना कम था, जरा मुश्किल होता था। पर यिद कभी एक-सी दो साड़ियां मिल जाती थीं तो उन्हें संभालकर रखा जाता था कि उन्हें साथ-साथ पहनकर बाहर जा सकें। मां जब भी कभी कहीं जायें और रास्तें में इलाहाबाद पड़ता हो तो वे एक दिनल वहां जरूर रूकतीं। अगर कभी किसी कारण से इलाहाबाद न उतर सकती हों तो महादेवी जी को स्टेशन पर बुला लेतीं।

एक बार महादेवी जी किसी साहित्यिक आयोजन में जबलपुर आयीं। उनके ठहराने की व्यवस्था किसी बड़े आदमी के घर की गयी थी, लेकिन उन्होंने मां के साथ उनके टूटे-फूटे घर में ही ठहरना पसन्द किया। सबेरे मां ने उनसे कहा,
'महादेवी, तुम जरा बैठो, मैं आंगन लीप लूं तब फिर तुम्हारे साथ बैठूंगी।'
महादेवी ने कहा,
'तुम क्या समझती हो, मुझे लीपना नहीं आता बहुत अच्छा लीपना जानती हूं।' मां बोलीं, 'तुम जानती होगी पर मेरे समान जल्दी नहीं लीप पाओगी।'
महादेवी इस बात को क्यों मानती, बोलीं,
'अच्छी बात है, मैं एक तरफ से लीपना शुरू करती हूं और तुम दूसरी तरफ से। देखें कौन जल्दी लीपता है और अच्छा लीपता है।'
और दोनों ने आंगन के दो विपरीत कोनों से लीपना शुरू किया।

जबलपुर के साहित्यिकों और साहित्य-प्रेमियों ने सुना कि हमारे शहर में प्रसिद्घ कवयित्री महादेवी वर्मा पधारी हैं और सुभद्रा जी के घर ठहरी हैं। सबेरे-सबेरे सब लोगों ने दल बनाकर वहां धावा बोल दिया और जब हमारे घर पहुंचे तो देखा कि दोनों कवयित्रियां पूरे मनोयोग से आंगन लीपने में जुटी हुयी हैं।

ऎसे ही मां एक बार शाम को इलाहाबाद में महादेवीजी के घर पहुंची। उन्होंने तांगे पर से अपना सामान नहीं उतरवाया और महादेवीजी को बुलाकर उनसे कहा कि '
देखो, इस बार मैं तुम्हारे घर पर नहीं ठहरूंगी',
और इलाहाबाद के एक अध्यापक कवि का नाम लेकर बोलीं कि '
उनका बहुत आग्रह है, मैं एक बार उनके साथ ठहरूं तो इस बार मैं वहं जाऊंगी। चलो तुम भी मेरे साथ चलो, फिर लौट आना।'
महादेवी जी बोलीं कि '
अच्छा, चलो मैं भी चलती हूं। सुना है उनकी पत्नी बहुत बढ़िया कचौरी बनाती हैं। अच्छा है, आज कचौरियां खायें।'

तांगे में बैठकर दोनों उन कवि महोदय के घर पहुंचीं। दरवाजा खटखटाया गया परन्तु दरवाजा खुलने के पहले ही उन महाशय की पत्नी ने इस तरह के बिन बुलाये मेहमानों के लिए अपने पति को लताड़ना शुरू किया और जोरदार शब्दों में बता दिया कि वे दुनिया भर के लिए खाना नहीं पका सकती हैं। लोगों ने समझ क्या रखा है, मुंह उठाया और चले आये। पतिदेव अपनी पत्नी का क्रोध शान्त करने में लगे थे, पर इन दोनों सहेलियों ने इस बीच चुपचाप प्रत्यावर्तन में ही कल्याण समझा और घर में कचौरी न सही, जो भी गरम-गरम भोजन मिला, उसे में तृप्ति पायी।


मिला तेज से तेज
सुभद्रा कुमारी चौहान -बचपन, विवाह।। जबलपुर आगमन, मुश्कलें, और रचनायें।। जीवन की कुछ घटनायें।। महादेवी वर्मा।।

(सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी, इनकी पुत्री, सुधा चौहान ने 'मिला तेज से तेज' नामक पुस्तक में लिखी है। हम इसी पुस्तक के कुछ अंश, हंस प्रकाशन के सौजन्य से प्रकाशित कर रहें हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान की सारी रचनायें 'सुभद्रा समग्र' में हैं।

इन दोनो पुस्तकों को हंस प्रकाशन १८, न्याय मार्ग, इलाहाबाद दूरभाष २४२३०४ ने प्रकाशित किया है। 'मिला तेज से तेज' पुस्तक के पेपरबैक प्रकाशन का मूल्य ८० रूपये और हार्ड कवर का मूल्य १६० रूपये है। 'सुभद्रा समग्र' पुस्तक के हार्ड कवर का मूल्य ३५० रुपये है। इन दोनो पुस्तकों को आप हंस प्रकाशन से पोस्ट के द्वारा मंगवा सकते हैं।)

Sunday, September 16, 2007

सुभद्रा कुमारी चौहान - जीवन की कुछ घटनायें: मिला तेज से तेज

दिसम्बर सन् २१ में लक्ष्मण सिंह और सुभद्रा अहमदाबाद कांग्रेस में गये। लौटते समय कुछ दिनों के लिए साबरमती आश्रम में भी रूके। सुभद्रा बापू के दर्शन करने उनकी कुटिया में गयीं जहां कस्तूरबा भी उनके साथ थीं। त्याग और सादगी के आवेश में आकर सुभद्रा, जो कि यों गहनों और कपड़ों को बहुत शौकीन थीं, उन दिनों जबकि उनकी उम्र केवल सोलह-सत्रह साल की थी, एकदम सफेद खादी की बिना किनार की धोती पहनती थीं, उनके हाथ में न तो चूड़ियां होती थीं और न माथे पर बिंदी। ऎसी कम उम्र की लड़की को ऎसे वेश में देखकर बा और बापू ने मन में जाने क्या सोचा होगा। आखिर बापू ने सुभद्रा से पूछ ही लिया--बेन, तुम्हारा ब्याह हो गया है ? सुभद्रा ने कहा, 'हां' और फिर उत्साह में आकर बताया कि मेरे पति भी मेरे साथ आये हैं। इस बात को सुनकर बा और बापू जहां आश्वस्त हुए वहां कुछ नाराज भी हुए। बापू ने सुभद्रा को डांटा-- तुम्हारे माथे पर सिन्दूर क्यों नहीं है ? और तुमने चूड़ियां क्यों नहीं पहनीं ? जाओ कल किनारेवाली साड़ी पहनकर आना।
...

'मुकुल' की कविताएं पढ़कर या उसमें उनका चित्र देखकर कोई सज्जन बड़े प्रभावित हुए। उन्होंने सुभद्रा को एक पत्र लिखा जिसमें उनकी कविता की भूरि-भूरि प्रशंसा थी और इसी तरह की और इस बात का उल्लेख था कि पत्र-लेखक की भी साहित्य में अभिरूचि है और इसी तरह की और भी कुछ सूचनाएं अपने विषय में देते हुए पत्र-लेखक ने अपनी यह इच्छा व्यक्त की थी कि यदि सुभद्रा को आपत्ति न हो तो वे उनसे विवाह करने को उत्सुक हैं!

सुभद्रा को पत्र पढ़कर बहुत हंसी आयी। उन्होंने उत्तर दिया कि
'आपका पत्र पाकर मैं सम्मानित हुई। आपको मेरी कविताएं पसन्द हैं, इसके लिए मैं कृतज्ञ हूं। जहां तक विवाह की बात है तो इस समय मेरे पति जेल में हैं, घर में मैं हूं, मेरी सास हैं और दो बच्चे हैं। यदि इन सब के साथ मुझसे विवाह करने में आपको आपत्ति न हो तो फिर मैं इस विषय पर सोचूंगी'
और साथ में यह भी लिख दिया कि पुस्तक में उनका जो चित्र छपा है वि पांच-छ: वर्ष पहले का है। इस पत्र का जवाब न आना था और न आया पर कुछ दिन इसको लेकर घर में काफी दिल्लगी रही।
...

जयपुर में ये लोग किसी साहित्य-प्रेमी के अतिथि थे। एक दिन अपने आतिथेय के साथ ये लोग किसी सभा या गोष्ठी में सम्मिलित होने कोजा रहे थे । रास्ते में किसी मकान में बहुत भीड़-भाड़ देखी, शायद शादी-व्याह का घर था । पुराना कोठीनुमा मकान था । सामने ड्योढ़ी में से दिखा कि भीतर सहन में बाईजी का नाच हो रहा है। शहरों में जहाँ आधुनिक सभ्यता तरह-तरह की वर्जनाओं का पर्याय बन गयी है, ऎसा दृश्य सड१क के किनारे देखने को शायद ही मिलता हो । माँ ने कहकर तांगा रूकवाया, लोग समझे नहीं कि मामला क्या है। वे बोलीं, जरा कुछ देर नाच देख लें तब चलेंगे । उनके इस खिलण्डरेपन को वही समझ सकता था, जो उन्हें निकट से जानता हो । उनके आतिथेय ने पता नहीं उनके बारे में क्या सोचा होगा , शायद यही कि यह देशसेविका, चार-पाँच बच्चों की माँ, विधानसभा की सदस्या और प्रसिद्घ कवियत्री कैसी है जो इस तरह का कौतूहल दिखा रही है, यह तो उसके पद की गरिमा के अनुकूल नहीं । नागपुर के प्रसिद्घ सशस्त्र सत्याग्रह के प्रेरणा-श्रोत जनरल अवारी,जो नागपुर के झण्डा सत्याग्रह में माँ और काका के साथ ही थे, बताते थे कि सुभद्रा के नाम पर देखते-देखते हजारों की भीड़ इकट्ठा हो जाती। और वही सुभद्रा मौका मिलने पर लट्टू भी नचा लेती थीं। काका ने भी कभी नहीं चाहा कि वे अपना सहज स्वभाव छोड़कर कवि या राजनीतिक नेता की गुरूगम्भीर मुद्र अपनायें।
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मां पहली मई की शाम को छोड़ी गयी थी और ४ मई आपरेशन की तारीख तय की गयी थी। बीच में दो दिन छुट्टी के मिलते थे। उन्होंने डाक्टर से कहा कि वे एक बार अपने घर जाना चाहती हैं। डाक्टर ने केवल दो घण्टे के लिए घर जाने की अनुमति दे दी। लेकिन एक बार जब इतनी छूट मिल गयी तो मां ने उनसे कहा कि वे एक सिनेमा भी देखना चाहती हैं, मुक्त होने का कुछ तो सुख उठा लें ! बड़े बेमन से डाक्टर ने उसकी भी आज्ञा दे दी। शाम को मां कुछ देर के लिए घर आयीं और फिर हम सब को साथ लेकर सिनेमा देखने गयीं। लेकिन इतना चलने-फिरने या मुक्त होने की उत्तेजना से वे इतना ज्यादा थक गयीं थीं कि बेहोश हो गयीं। हम लोग मां कु मुंह पर पानी के छीटे मार-कर किसी- किसी तरह उनको होश में लाये और फिर उन्हें लेकर सीधे अस्पताल चले गये।

मिला तेज से तेज
सुभद्रा कुमारी चौहान -बचपन, विवाह।। जबलपुर आगमन, मुश्कलें, और रचनायें।। जीवन की कुछ घटनायें।।

(सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी, इनकी पुत्री, सुधा चौहान ने 'मिला तेज से तेज' नामक पुस्तक में लिखी है। हम इसी पुस्तक के कुछ अंश, हंस प्रकाशन के सौजन्य से प्रकाशित कर रहें हैं। इस चिट्ठी में उनके जीवन की कुछ घटनायें हैं। सुभद्रा कुमारी चौहान की सारी रचनायें 'सुभद्रा समग्र' में हैं।

इन दोनो पुस्तकों को हंस प्रकाशन १८, न्याय मार्ग, इलाहाबाद दूरभाष २४२३०४ ने प्रकाशित किया है। 'मिला तेज से तेज' पुस्तक के पेपरबैक प्रकाशन का मूल्य ८० रूपये और हार्ड कवर का मूल्य १६० रूपये है। 'सुभद्रा समग्र' पुस्तक के हार्ड कवर का मूल्य ३५० रुपये है। इन दोनो पुस्तकों को आप हंस प्रकाशन से पोस्ट के द्वारा मंगवा सकते हैं।)

Sunday, September 09, 2007

सुभद्रा - जबलपुर आगमन, मुश्कलें, और रचनायें: मिला तेज से तेज

(सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी, इनकी पुत्री, सुधा चौहान ने 'मिला तेज से तेज' नामक पुस्तक में लिखी है। हम इसी पुस्तक के कुछ अंश, हंस प्रकाशन के सौजन्य से प्रकाशित कर रहें हैं। इस चिट्ठी में उनके जबलपुर जाने का करण, वा इनके लिखे गयी रचनाओं के बारे में है। सुभद्रा कुमारी चौहान की सारी रचनायें 'सुभद्रा समग्र' में हैं।

इन दोनो पुस्तकों को हंस प्रकाशन १८, न्याय मार्ग, इलाहाबाद दूरभाष २४२३०४ ने प्रकाशित किया है। 'मिला तेज से तेज' पुस्तक के पेपरबैक प्रकाशन का मूल्य ८० रूपये और हार्ड कवर का मूल्य १६० रूपये है। 'सुभद्रा समग्र' पुस्तक के हार्ड कवर का मूल्य ३५० रुपये है। इन दोनो पुस्तकों को आप हंस प्रकाशन से पोस्ट के द्वारा मंगवा सकते हैं।)


माखनलाल चतुर्वेदी ने जबलपुर से 'कर्मवीर' का प्रकाशन आरम्भ कर दिया। लक्ष्मण सिंह को पत्रकारिता एक ऎसा माध्यम लगा जिसके द्वारा देश-सेवा और जीविकोपार्जन दोनों का साथ-साथ निर्वाह हो सकता था। अबकी बार पति-पत्नी दोनों जबलपुर आये। पत्नी शायद सास के अनुशासन में रहकर मात्र सुघर गृहिणी बनकर सन्तुष्ट नहीं थी। उसके भीतर जो तेज था, काम करने का जो उत्साह था, कुछ नया कर जाने की जो लगन थी, उसके लिए घर की चहारदीवारी की सीमा बहुत छोटी थी। यों भी यह एक स्वाभाविक बात थी कि पति-पत्नी दोनों साथ रहना चाहते हों। जबलपुर से 'कर्मवीर' के प्रकाशन द्वारा उन दोनों को यह मनचाही राह मिल गयी। माखनलाला जी 'कर्मवीर' के प्रधान सम्पादक थे और लक्ष्मण सिंह, साहित्य-सम्पादक। माखनलाल जी कांग्रेस के नेता थे, उसके काम से उन्हें अक्सर बाहर रहना पड़ता था। ऎसी दशा में 'कर्मवीर' के सम्पादन का अधिकांश भार लक्ष्मण सिंह को ही उठाना पड़ता था।
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तभी सन् २८-२९ में इलाहाबाद के एक युवक प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त' के पत्र सुभद्रा के पास आने लगे। कालान्तर में उन्हीं की इच्छा और प्रयत्नों से सुभद्रा की कविताओं का पहला संग्रह 'मुकुल' के नाम से निकला।
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'मुकुल' प्रकाशित हुआ और हिन्दी-संसार ने दिल खोलकर उसका स्वागत किया। उसी वर्ष हिनदी साहित्य सम्मेलन ने लेखिकाओं के लिए सेकसरिया पुरस्कार की घोषणा की थी। पांच सौ रूपयों का यह पुरस्कार सबसे पहले 'मुकुल' को मिला। अपने गाढ़े दिनों में सुभद्रा को 'मुकुल' से एकमात्र यही पांच सौ रूपये की राशि प्राप्त हुयी जो उनके बहुत काम आयी। उसके बाद 'मुकुल' के कई संस्करण छपे, एकाधिक स्थानों पर वह पाठ्यपुस्तक के रूप में स्वीकृत हुआ, पर सुभद्रा को उससे कोई अर्थ प्राप्ति नहीं हुयी।
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इस बीच बिखरे मोती छप गया था और उस पर पुरस्कार भी मिल चुका था। एक दिन काका ने मां से कहा कि 'लाओ भाई, मैं भी तो पढ़ूं, कैसी हैं तुम्हारी कहानियां।' बाद में मां सदा हंसकर इस बात को बताती थीं, पर अपने साहित्य- रसिक पति से ही सबसे अन्त में प्रशंसा पाने का क्षोभ उनके मन में कहीं न कहीं रहा ही होगा।

मां की अधिकांश कहानियों का उत्स किसी न किसी सत्य घटना के भीतर होता था, लेकिन उसमें कल्पना का ताना-बाना उसे कुछ का कुछ बना देता था।

उनकी एक कहानी है, 'चढ़ा दिमाग'; उसमें सम्पादक जी लेखिका और लेखिका एक अन्य व्यक्ति को लिखे गये पत्रों के लिफाफे भूल से बदल देते हैं और लेखिका को सम्पादक जी का वह पत्र मिल जाता है, जो उन्होंने उस अन्य व्यक्ति को लेखिका की शिकायत करते हुए लिखा है कि वह न तो पत्रों का जवाब भेजती है और न कोई कहानी ही भेज रही है, उसके मूल में भी एक सत्य घटना है। श्री इलाचन्द्र जोशी जब 'विश्वमित्र' के सम्पादक थे तो उन्होंने मां को लिखा गया पत्र नर्मदाप्रसाद खरे को भेज दिया था और गलत लिफाफे में रखे जाने के कारण खरे जी को लिखा गया पत्र मां के पास आ गया था। उस कहानी में वर्णित कुर्की की घटना भी उनके अपने अनुभव की ही है।

इसी प्रकार 'एकादशी' में जिस ब्राम्हण बाल-विधवा का वर्णन है, वह भी सत्य घटना पर आधारित है और उस कहानी का डाक्टर सम्भवत: डाक्टर जार्ज डिसिलवा थे, जो एक अच्छे डाक्टर होने के साथ-साथ जबलपुर के एक बड़े ही नि:स्पृह और निडर कांग्रेस कार्यकर्ता थे, जिन्हें अपने उन्हीं गुणों के कारण कांग्रेस की नेताशाही में कभी कोई स्थान नहीं मिला।

मां की अधिकांश कहानियों में परिवार के कठोर अनुशासन में जकड़ी हुयी परवश नारी की पीड़ा या समाज से टक्कर लेने के लिए उद्यत विद्रोहिणी नारी के विवश क्रोध का स्वर ही प्रमुख है। उनकी कहानी की नायिका अपने व्यक्तित्व के सम्मान के लिए समाज को चुनौती दे सकती है, पुरूषों से बराबरी की मित्रता का सम्बन्ध बना सकती है। लेकिन उनकहानियों की विद्रोहिणी नारी बहुत सी कहानियों में अपने प्रति किये गये अन्यायों से हारकर, टूटकर या तो पागल हो जाती है या आत्महत्या कर लेने को विवश हो जाती है।

एक कहानी 'मंझली रानी' इस प्रकार शुरू होती है----

'वे मेरे कौन थे ? मैं क्या बताऊं ! वैसे देखा जाय तो वे मेरे कोई भी न होते थे। होते भी कैसे। मैं ब्राम्हण, वे क्षत्री; मैं स्त्री, वे पुरूष फिर न तो रिश्तेदार हो सकते थे और न मित्र। आह, यह क्या कह डाला मैंने! मित्र ? भला किसी स्त्री का कोई पुरूष भी मित्र हो सकता है और यदि हो भी तो समाज इसे बर्दाश्त करेगा ?... यदि कोई स्त्री किसी पुरूष से किसी प्रकार का व्यवहार रखती है, प्रेम से बातचीत करती है, तो वह स्त्री भ्रष्टा है, चरित्र-हीना है।'
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एक दीवाली की बात है, काका शहर से बाहर गये हुए थे और ऎन दीवाली के रोज माँ को सहसा ध्यान
आया कि बच्चों के लिए खिलौने, मिठाई, पटाखे मँगाने को उनके पास रूपये नहीं हैं। अब क्या हो ? तो उन्होंने बच्चों के लिए जो कविताएँ लिखी थीं, उनकी कापी उठायी और बच्चों को साथ लेकर वे स्कूली किताबों के एक प्रकाशक के घर पहुँचीं कि उसे कविता-पुस्तक देकर उससे कुछ रूपये ले लें। उन्हें पूरा विश्वास था कि रूपये मिल जायेंगे तो वहीं से बाजार जाकर दीवाली का सब सामान खरीद लिया जायगा। यही सोचकर उन्होंने बच्चों को भी साथ ले लिया। लेकिन माँ दुनियादारी से अनभिज्ञ हों तो हों , प्रकाशक तो अनभिज्ञ नहीं था। दीवाली के दिन कौन लक्ष्मी को अपने घर से जाने देता है। अत: प्रकाशक ने उस दिन रूपया देने से बिल्कुल इनकार कर दिया। इस आने जाने में जो दो- चार रूपये हाथ में थे वे भी ताँगे वाले को भेट हो गये । और माँ अपने बच्चों को लेकर निराश घर लौट आयीं । शाम को पाठक जी आये तो उन्हें मालूम हुआ कि बच्चों के लिए मिठाई, पटाखे आदि कुछ भी नहीं आये । वे उल्टे पाँव लौटे और घण्टे-दो-घण्टे बाद सब चीजें लेकर आ गये। बच्चे निराश होकर शाम से ही बिस्तरों पर दुबक गये थे। लेकिन फिर पटाखों के शोर-गुल में उन लोगों की निराशा आनन-फानन उड़ गयी और खूब धमाचौकड़ी मची।
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माँ और काका की अनुपस्थिति में इसी तरह लस्टम-पस्टम उनकी गिरस्ती की गाड़ी चलती रही। माँ अपनी किताब बेचकर जो कुछ मुझे दे गयी थीं और भी जो कुछ घर में मिला, उसका अधिकांश खेती में ही लग गया। एक दिन ऎसी स्थिति आयी कि घर कमा एक-एक पैसा चुक गया था। तब तक सरकारी भत्ता मिलना शुरू नहीं हुआ था। तब मेरी उम्र ऎसी नहीं थी कि मैं बहुत चिन्ता करती, फिर भी इस चिन्ता से कि कल यदि एक पैसे का भी खर्च सामने आ जाय तो मैं क्या करूंगी , मुझे रात को नींद नहीं आयी। माँ स्वयं इतनी ज्यादा खरीददारी करती थीं कि उनके घर में कभी किसी और को पैसा खर्च करने का मौका नहीं मिलता था । इसलिए खरीदारी करना या पैसा खर्च करना मुझे आता भी नहीं था । अपनी माँ कली यह फिजूलखर्ची की आदत इस समय हम बहन भाइयों के बहुत काम आयी। एक तो हमें पैसा खरचने की आदत नहीं पड़ी ,दूसरे अपनी माँ की अतिरिक्त खरीदारी के कारण हमारे पास इतने कपड़े थे कि साल भर तक तो एक भी कपड़ा बनवाने की जरूरत नहीं थी। यों भी घर में रोज की जरूरतों की सभी चीजें थीं। फिर भी साग-सब्जी खरीदने को, बिजली का बिल चुकाने को, महराजिन और महरी की तन्ख्वाह देने को और इसी तरह के दूसरे छोटे - मोटे कामों के लिए रूपयों की जरूरत पड़ती ही है। बहुत रात तक उधेड़-बुन करते-करते कभी मेरी आंख लग गयी। सबेरे भाइयों को स्कूल भेजने और खुद अपनी तैयारी करने की व्यस्तता में मैं रात की चिन्ता की बात भूल चुकी थी। दोपीर को पोस्टमैन चालीस रूपये का एक मनीआर्डर लेकर आया। बी.बी.सी. से मां की कविताएं फौज के लिए प्रसारित की गयी थीं, उसी का यह रूपया था। किसे यह कल्पना हो सकती थी कि अंग्रेज सरकार जिस कवि के मुक्त रहने में अपने अस्तित्व के लिए खतरा देखती है, उसी की कविता वह अपने सिपाहियों के लिए प्रसारित करेंगे ! जो हो, मुझको इस समय वह रूपया ऎसा ही लगा, जैसे भगवान् ने मेरी पुकार सुनकर भेजा हो।


मिला तेज से तेज
सुभद्रा कुमारी चौहान -बचपन, विवाह।। सुभद्रा - जबलपुर आगमन, मुश्कलें, और रचनायें।।

Sunday, September 02, 2007

सुभद्रा कुमारी चौहान -बचपन, विवाह: मिला तेज से तेज

{सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी, इनकी पुत्री, सुधा चौहान ने 'मिला तेज से तेज' नामक पुस्तक में लिखी है। इसे हंस प्रकाशन १८, न्याय मार्ग, इलाहाबाद दूरभाष २४२३०४ ने छापी है। इस पुस्तक के पेपरबैक प्रकाशन का दाम ८० रूपये और हार्ड कवर का दाम १६० रूपये है। इस पुस्तक को आप हंस प्रकाशन से पोस्ट के द्वारा मंगवा सकते हैं।

आने वाली कुछ चिट्ठियों में, हम इसी पुस्तक के कुछ अंश, हंस प्रकाशन के सौजन्य से प्रकाशित करेंगे।

सुभद्रा कुमारी चौहान का बचपन इलाहाबाद में बीता और पढ़ाई इलाहाबाद के क्रास्थवेट स्कूल में। यहां आपकी मित्रता महादेवी वर्मा से हुई।

सुभद्रा कुमारी चौहान, चार बहने और दो भाई थे। भाइयों में से एक राजबहादुर सिंह (रज्जू भैइया) थे। आपकी शादी लक्षमण सिंह के साथ हुई थी। इस चिट्ठी में उनके बचपन और लक्षमण सिंह के साथ विवाह की चर्चा है।}

चारों बहनों में रानी बड़ी होने के अनुरूप ही अधिक गम्भीर और शान्त थीं। सुन्दर बहुत ही मीठे स्वभाव की, स्नेही और सन्तोषी लड़की थी। सुभद्र बहुत चंचल थीं। जो बात उसे पसन्द न आये उसके खिलाफ विद्रोह करने में उसको देर न लगती। कमला सबसे छोटी थी। सब बहनों के दुलार ने उनके व्यक्तित्व को जैसे छा लिया था। यों तो चारों बहनों में भी लड़ाई कम ही होती थी पर सुन्दर और सुभद्रा में विशेष रूप से पटती थी। दोनों सदा साथ-साथ रहतीं, साथ-साथ खाने बैठतीं। गोमती भी साथ रहती थी। पीने का पानी या तो सुनदर रखें या गोमती। सुभद्रा पानी कभी न रखती पर चट से उठाकर पी जाती थी। एक बार सुन्दर बिगड़ गयीं, बोलीं, 'यह पानी रखती तो नहीं है पर पी लेती है,' और उठाकर भरा लोटा सुभद्रा पर उलट दिया। सुभद्रा गुस्सैल तो थी ही, दबना भी नहीं जानती थी; उसने भी अपने हाथ का गिलास चट से सुन्दर पर उडेल दिया। दोनों बहनें भीग गयीं। लेकिन उसे ठण्डे पानी ने लड़ाई को भी ठण्डा कर दिया।
...

यहीं इलाहाबाद में पढ़ते हुए लक्ष्मण सिंह की पहचान राजबहादुर सिंह से हुयी और धीरे-धीरे उनका निहालपुर आना-जाना भी शुरू हुआ।

लक्ष्मण सिंह बहुत साफ रंग के सुरूप मॅझोले कद के आदमी थे। रज्जू भैया को यह लड़का सुभद्रा के लिये पसन्द आया। उनको मालुम था कि यह लड़का गरीब घर का है। अपनी मेहनत से ट्यूशन करके वह अब तक पढ़ता आया है और अब भी अपनी हिम्मत से ही आगे पढ़ रहा है। रज्जू भैया ने भी ट्यूशनों के सहारे ही पढ़ाई की थी, इसलिए यह उनकी दृष्टि में कोई अवगुण नहीं था। अब तक पर्दें के बन्धन भी कुछ-कुछ ढीले हो गये थे। हो सकता है, लक्ष्मण सिंह ने कभी सुभद्रा को देखा भी हो, उसकी प्रशंसा तो जैसे उन्होंने सुन ही रखी थी। एक बार जब लक्ष्मण सिंह निहालपुर गये, तो रज्जू भैया ने अपनी मां और भौजी से भी कहा कि लड़का देख लो। लक्ष्मण सिंह जब उन लोगों के सामने पहुंचे तो लाज के मारे उनका गोरा चेहरा एकदम लाल पड़ गया। दीदी और भौजी को भी लक्ष्मण सिंह अच्छे लगे, बस उनके मन में यही खटक थी कि वे बहुत दूर, खण्डवा के रहने वाले थे। अब निहालपुर लक्ष्मण सिंह की भावी ससुराल थी। वे जब भी वहां जाते, उनके सारे मित्र उनका राजसी ठाठ बना देते। कोई अपना बढ़िया जयपुरी साफा बांध देता, कोई नया कोट पहना देता और कोई अपना पालिश किया हुआ जूता। उनके शरीर पर कोई भी पुराना घिसा-पिटा कपड़ा नहीं रहने पाता। वे चाहे जितना भी विरोध करें पर इन सब तैयारियों के बिना वे निहालपुर नहीं जा पाते थे।
...

यों सुभद्रा जैसी सुनदर, गुणसम्पन्न और तेजस्विनी लड़की के लिए पैसे वाले वर का भी अभाव नहीं था। रज्जू भैया की ही मित्रतंडली में अलीगढ़ के जमींदार घराने के एक बैरिस्टर साहब थे। वे एक बार सुभद्रा से विवाह करने की इच्छा व्यक्त कर चुके थे पर उनकी उम्र कुछ अधिक थी। रज्जू भैया अपनी सुकुमारी सुरूपा बहन सुन्दर का विवाह अधिक उम्र के वर से करने की ग्लानि अभी तक मन से निकाल नहीं पाये थे। सुभद्रा उनकी बहुत प्यारी बहन थी और वह स्वभाव से ही विद्रोहिणी थी। उसे उसके समान ही उदार विचारों वाला साहसी वर चाहिए था। रज्जू भैया को लक्ष्मण सिंह में अपनी बहन के अनुरूप गुण दिखायी पड़ें और उन्हें निश्चय करने में देर न लगी।

राजबहादुर सिंह ने अपने संस्मरण में एक जगह लिखा है कि 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कानवोकेशन के समय क्रास्थवेट गवर्नमेन्ट स्कूल की तरफ से सिनेट हाल में एक समारोह हुआ, जिसमें मिस मानकर का भाषण हुआ। एक और वक्ता का भी भाषण हुआ; जो कन्या इस कार्य के लिए चुनी गयी थी वह सुभद्रा थी। सुभद्रा के भाषण से लोग अत्यन्त प्रभावित हुए। यह सन् १६-१७ की बात होगी। उस समय मैं अध्यापक था। सुभद्रा की सूरत-शकल से लोग पहचान गये कि वह मेरी बहन है। उन्होंने आकर मुझे बहुत बधाई दी।'

एक दिन रज्जू भैया, लक्ष्मण सिंह और अपने एक मित्र के साथ क्रास्थवेट स्कूल की हेडमिस्ट्रेस मिस मानकर से मिलने के लिए गये। उन्होंने बातों के प्रसंग में मिस मानकर को बताया कि लक्ष्मण सिंह से सुभद्रा का विवाह तय हो गया है। मिस मानकर सुभद्रा को बहुत मानती और प्यार करती थीं। उन्होंने राजबहादुर सिंह से कहा कि आप इस लड़की का विवाह न करें, यह तो एक ऎतिहासिक लड़की होगी। इसका विवाह करके आप देश का बड़ा नुकसान करेंगे। मिस मानकर लक्ष्मण सिंह को जानती नहीं थीं, अन्यथा वे समझ जातीं कि समानधर्मा दो व्यक्ति एक दूसरे के लिए बाधक नहीं प्रेरक बन जाते हैं।
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शादी कराके बारात वधू को लेकर विदा हुई। इलाहाबाद से खण्डवा तक का लम्बा रास्ता था और सन् १९१९ में चलने वाली रेलेगाड़ी थी जिसकी धीमी गति के कारण रास्ता और लम्बा हो जाता होगा। इटारसी स्टेशन पर गाड़ी शायद घण्टा भर रूकती थी। लक्ष्मण सिंह को बरातियों के बीच, 'जिमि दशनन बिच जीभ बिचारी' जैसी सिकुड़ी-सिमटी बैठी सुभद्रा पर शायद तरस आ गया। उसे लेकर वे प्लेटफार्म पर उतर गये और मजे से उसके एक-दो चक्कर लगाये। उनके बड़े भाई उमराव सिंह इस विवाह से यों ही असन्तुष्ट थे। एक तो छोटे भाई ने अपने मन से शादी तय कर ली, फिर शादी में न पर्दा किया गया और न लेन-देन, नेग-व्यवहार की ही कोई रस्म की गयी। ऎसी अजीब शादी उन्हें बिल्कुल पसन्द नहीं आयी, और अब ऊपर से यह बदतमीजी कि बरात लेकर घर भी नहीं पहुंचे और बहू के साथ घूमना शुरू कर दिया! ऎसी बेशर्मी वे अपने घर में नहीं चलने देंगे! खण्डवा पहुंचने तक वे किसी तरह अपने को वश में किये रहे, लेकिन वहां पहुचने पर वे दूसरे बरातियों से पहले ही घर जा पहुंचे और हाथ में डंडा लेकर दरवाजे पर खड़े हो गये। उनका हुकुम था कि पहले बहू घूंघट निकालेगी, तब घर के अन्दर घुसने पायेगी। हो सकता है कि लक्ष्मण सिंह के कुछ बोलने के पहले ही सुभद्रा ने इस अशोभन प्रसंग को समाप्त करने के लिए घूंघट निकाल लिया हो। लेकिन रूढ़ियों से उनका यह टकराव जो ससुराल की देहलीज से शुरू हुआ वह आजीवन चलता रहा। उनका ये कभी-कभी का झुकना बेंका लचीलापन था, जो उसे आंधी में टूट जाने से तो बचाता है, पर अपनी जगह दृढ़ता से खड़ा रखता है। उन दिनों पर्दा न करना कितनी बड़ी बात होगी कि लक्ष्मण सिंह की शादी के तीन-चार दिन बाद जब उनके मित्र बाबूलाल तिवारी कहीं बाहर से खण्डवा लौटे तो उन्होंने घर-घर में यह चर्चा सुनी कि ये लक्ष्मण जाने कैसी औरत ब्याह लाया है जो मुंह उघाड़े घूमती है।

मिला तेज से तेज
सुभद्रा कुमारी चौहान -बचपन, विवाह

Sunday, August 19, 2007

जिक्र-ए-फिराक गोरखपुरी: तुझे ए जिन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं

"बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं। तुझे ए जिन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं।" जैसी पंक्तियों को देने वाले फिराक गोरखपुरी की याद किये बिना इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़ी कोई भी बात पुरी हो ही नहीं सकती। उर्दू शायरी को अनमोल कृतियां देने वाले फिराक से जुड़े अनगिनत संस्मरण आज भी लोगों के जेहन में हैं। प्रस्तुत है फिराक की याद करते हुए उर्दू विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. ए.ए.फातमी का यह आलेख:

यूं तो फिराक के नाम के साथ गोरखपुर लगा हुआ है और वह पैदा भी गोरखपुर में हुए, लेकिन १९१३ में गोरखपुर से हाई स्कूल पास करने के बाद इलाहाबाद आ गये और फिर यहीं के हो रहे। इलाहाबाद की साहित्यिक व राजनैतिक सरगरमियों ने कुछ ऎसा प्रभावित किया और फिर घेरा कि वह आई.सी.एस. में चुने जाने के बाद भी नहीं गये। उनके ऊपर उस समय शायरी के साथ-साथ वतनपरस्ती का जज्बा हावी था और वह नेहरू व गांधी से बेहद प्रभावित थे। १९२० के आस पास वह इलाहाबाद में नेहरू परिवार के करीब आ चुके थे और बकायदा सियासी जलसों में शरीक होने लगे थे। १९२० में ही जब जार्ज पंचम के वली अहद प्रिंस आफ वेल्स भारत का दौरा करने आये तो गांधी जी के नेतृत्व में इस दौरे का बायकाट किया गया। बहुत से लोग गिरफ्तार कर लिए गये। पंडित नेहरू की गिरफ्तारी के बाद इलाहाबाद में कांग्रेस की सूबाई कमेटी की मीटिंग हुयी, जिसमें फिराक पूरे जोर व शोर से शरीक हुए और गिरफ्तार हुए। उन्हें मलाका जेल ले जाया गया, मुकदमा चला। कुछ कैदी नैनी जेल भेजे गये, कुछ आगरा जेल। फिराक आगरा जेल के कैदियों में थे।

फिराक साल भर से ज्यादा जेल में रहे। जेल में मुशायरे भी होते थे। फिराक ने कई गजलें इसी जेल में कहीं। इनमें यह दो शेर काफी मशहूर हुए-
"अहले जिन्दा की यह महफिल है सुबूत इसका 'फिराक'
कि बिखर कर भी यह शीराजा परीशां न हुआ।
खुलासा हिन्द की तारीख का यह है हमदम
यह मुल्क वकफे-सितम हाए रोजगार रहा।"

जेल में ही उन्होंने हिन्दी में भी कुछ लेख लिखे और छपवाये, इन लेखों व गजलों को पढ़ने के बाद अंदाजा होता है कि उनकी गजलों में सिर्फ इश्को-मोहब्बत ही नहीं समाज और सियासत की बातें भी खूब हैं।
एक साल बाद वह आगरे से लखनऊ भेज दिये गये। जेल से निकलने के बाद फिराक आर्थिक रूप से काफी परेशान रहे। इसी समय नेहरू ने कांग्रेस पार्टी में शामिल होने का निमंत्रण दिया। एक लेख में फिराक खुद लिखते हैं-
"नेहरू ने मेरे हालात को देख कर मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि तुम आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी के अण्डर सेक्रेटरी की हैसियत से इलाहाबाद का दफ्तर सम्भाल लो। यह बात १९२३ की है। मैं ढाई सौ रूपये महीने पर आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी का अण्डर सेक्रेटरी हो गया।...”

फिराक १९२३ से लेकर १९२७ तक इस पद पर रहे। इस बीच वह नेहरू परिवार के बहुत करीब आ गये। वह नेहरू के सियासी चिंतन और बौद्घिक व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुए और नेहरू को सियासत का जगल गुरू कहने लगे। नेहरू को शायरी का काफी शौक था। अक्सर वह फिराक से शेर सुनते और आजादी के संघर्ष की बातों के माध्यम से भारत के इतिहास व संस्कृति पर विचार विमर्श भी करते। नेहरू के करीब होने से फिराक जो चाहते वह बन सकते थे, लेकिन उन्होंने ऎसा नहीं किया। इस बीच उन्होंने आगरा यूनिवर्सिटी से प्राइवेट अंग्रेजी में एम.ए. किया और १९३० में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी विभाग में प्रवक्ता हो गये और पठन पाठन व शेरो-शायरी में डूब गये। पहले इलाहाबाद और अब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में आने के बाद वह जैसे अपने सही पद और रास्ते पर आ गये थे।

३१ दिसम्बर १९३५ में जब प्रेमचंद व जोश आदि के साथ प्रगतिशील लेखक संघ की पहली बैठक हुई तो फिराक भी बराबर से शरीक थे। उनके अतिरिक्त प्रो. एजाज हुसैन, डा. अहमद अली, सज्जाद जहीर, रशीद जहां थे। प्रगतिशील लेखक आन्दोलन में फिराक आगे आगे थे। उन्होंने इसकी कई कान्फ्रेन्सों की अध्यक्षता की और लेख पढ़े। यही वह मोड़ है, जहां फिराक के जेहन में साहित्य व राजनीति घुल मिलकर एक हो गये और उनकी कलम से ऎसे वाक्य निकले-
"हमारा मुल्क हिन्दुओं की मिलकियत नहीं है और मुसलमानों की। यह मुल्क बनी नौ आदम की मादरे-वतन है, आज हमारे सीनों में तहजीब की पहली सुबहें सांसें ले रही हैं। कायनात और इंसानियत की वहदत के तसव्वर से आज भी हमारी आंखें नम हो जाती हैं-”

१९६० के आस-पास वह यूनिवर्सिटी से रिटायर हुए और १९८२ में वह इस दुनिया से रूखसत हुए। अपनी पचास साल की साहित्यिक व राजनैतिक जिन्दगी में इलाहाबाद से जो रिश्ता रहा वह अपने आप में एक इतिहास है। यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी विभाग के अलावा उर्दू विभाग से रिश्ते, एजाज हुसैन जैसा दोस्त, एहतेशाम हुसैन जैसा शागिर्द, उसके अलावा चाहने मानने वालों की एक भीड़, सैकड़ों खट्टे-मीठे वाकेयात, शहर का काफी हाउस, फिराक साहब के लतीफों व जुमलों से गुलजार रहता। कोई मुशायरा, कोई जलसा फिराक के बगैर हो ही नहीं सकता था।

फिराक साहब कहा करते थे-
"मैं शायरी का एक मकसद यह भी समझता हूं कि जिन्दगी के खुशगवार और नाखुशगवार हालात व तजुर्बात का एक सच्चा जमालियाती एहसास हासिल किया जाय। जिन्दगी का एक विजदानी शऊर हासिल करना वह आसूदगी अता करता है जिसके बगैर जिन्दगी के सुख-दुख दोनों नामुकम्मल रहते हैं। यही एहसास मेरी शायरी के रहे हैं; इसके अलावा हर कौम की अपनी एक तारीख होती है, उसका एक मिजाह होता है, फिर तमाम इंसानियत की जिन्दगी की भी तारीख होती है और उस जिन्दगी की कुछ कदरें होती हैं। कौमी जिन्दगी और आलमी जिन्दगी की इन कदरों और हिन्दुस्तान के कल्चर के मिजाज को अपनी शायरी में समोना मुल्की और आलमी जिन्दगी के पाकीजा जज्बात को जबान देना मेरी शायरी का मकसद रहा है। उर्दू शायरी में बहुत सी खूबियों के बावजूद कुछ कदरो की कमी रही है। १९३६ के बाद मेरी कोशिश यह होने लगी है कि मैं मसायल को आलमगीर इंसानियत की तरक्की की रोशनी में पेश करूं, जिन्दगी जैसी है उसे मुतास्सिर होना कौमी कलचर और कौमी मिजाज के तसव्वर पर झूमना उसे अब मैं नाकाफी समझने लगा। अब दुनिया और जिन्दगी पर झूमने के बदले दुनिया और जिन्दगी को बदलने का तसव्वर काम करने लगा।"

फिराक साहब केवल शायर न थे वह एक दानिश्वर, आलोचक और बहुत अच्छी बातचीत और बहस करने वाले इंसान थे। इलाहाबाद से उनके गहरे सम्बन्ध थे। इलाहाबाद और यूनिवर्सिटी से गहरा प्यार रखते थे और इसीलिये आखिरी सांस तक वह यूनिवर्सिटी के मकान में रहे। यूनिवर्सिटी ने उनको मान तो दिया, लेकिन वह सम्मान न दिया जिसके वे हकदार थे। उर्दू विभाग में तो फिराक पर कई कार्यक्रम हुए, शहर में भी हुए, लेकिन अंग्रेजी विभाग ने कोई याद बाकी न रक्खी। आज इसकी आवश्यकता है कि अंग्रेजी विभाग के सामने फिराक का स्टेचू और विश्वविद्यालय में एक फिराक मेमोरियल चेयर कायम की जाए।


पिछले साल से इलाहाबाद विश्वविद्यालय 'बरगद' के नाम से पत्रिका निकाल रहा है जिसमें इलाहाबद विश्वविद्यालय और इलाहाबाद के बारे में सूचना रहती है। फिराक गोरखपुरी पर यह लेख इस पत्रिका के पहले वर्ष के चौथे अंक से है और यह उसी के सौजन्य से है। इस पत्रिका में छपने के लिये रचनायें, सूचनायें व छाया चित्र आमंत्रित हैं।

इसके वार्षिक सदस्य बनें 'बरगद' की वार्षिक सदस्यता ग्रहण करने के लिये छात्र-छात्रायें ५० रूपये (पच्चीस रूपये डाक खर्च अतिरिक्त) अन्य १००रूपये (पचास रूपये डाक खर्च अतिरिक्त) बरगद के नाम ड्राफ्ट द्वारा इस पते पर भेजें।
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Saturday, August 04, 2007

जीवन के साधक : कर्म के आराधक - न्यायमूति श्री प्रेम शंकर गुप्त

(जुलाई २००७ में, भारत सरकार की ओर से आठवें अन्तराष्ट्रीय विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन न्यूयार्क अमेरिका में हुआ था। जहां न्यायमूति श्री प्रेम शंकर गुप्त को हिन्दी की उत्कृष्ट सेवा एवं प्रोत्साहन हेतु दिनांक १५ जुलाई, २००७ को विशेष सम्मान से विभूषित किया गया। इस अवसर पर यह लेख न्यायमूर्ती श्री पंकज मित्तल ने हमारे लिये लिखा है। आपको इस लेख को इसी प्रकार अथवा संशोधन कर बांटने, अपने चिट्ठे या विकीपीडिया पर डालने की अनुमति है कृपया इसका श्रेय न्यायमूर्ती श्री पंकज मित्तल वा इस कड़ी को दें। हमें प्रसन्नता होगी यदि आप हमारे लिये कोई लेख लिखें।)

वदनं प्रसन्न सदनं सदयं हृदयं सुधामुचोवाच:
करणं परोपकरणं केषां येषां नते वन्धा:
अथार्त, जिनका मुखमंडल सदा प्रसन्न रहता है, जिनका हृदय दया से परिपूर्ण रहता है, जिनकी वाणी से अमृत की वर्षा होती रहती है, जो निरन्तर परोपकाररत रहते है, उनकी सभी वन्दना करते हैं।

न्यायमूर्ति श्री प्रेम शंकर जी गुप्त का परिचय उच्च न्यायालय के अधिवक्ता, न्यायाधीश एवं हिन्दी के प्रबल पक्षधर व मनीषी के रूप में सर्व विदित है। वे निष्ठा की प्रतिमूर्ति हैं, आस्थाओं की मशाल हैं और संकल्पों के शलाका पुरूष हैं। हिन्दी, अन्य भारतीय भाषायें व साहित्य उनके हृदय की धड़कन है। राष्ट्र भक्ती उनके सांस्कृतिक व्यक्तित्व को एक मुखर तेजस्विता प्रदान करती है और राष्ट्रभाषा के लिए उनकी प्रतिबद्धता उनके व्यक्तित्व को विशेष रूप से परिभाषित करती है।

विधि क्षेत्र में उन्होंने अपने हिन्दी प्रेम एवं अपनी भारतीय सांस्कृति के प्रति निष्ठा का विलक्षण परिचय दिया है। वास्तव में आपका लेखन, विशेषतया विधि के क्षेत्र में आपका मौलिक अवदान मील का पत्थर कहा जा सकता है। अंग्रेजी भाषा पर भी आपका अच्छा अधिकार होते हुए आपने राज्य भाषा में अपने निर्णय लिखकर सभी देशवासियों को एक नई दिशा दी है। इस दिशा बोध के मूल में ´निज भाषा उन्नति´ का मूलमंत्र निरंतर मुखरित होता रहा है। वे ऐसे चिन्तक और विचारक है जो सोते जागते हिन्दी भाषा और साहित्य की उपासना और सेवा करते हैं। वे एक अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति अवश्य है किन्तु उनका यह अवकाश आज भी राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय संस्कृति के लिए समर्पित है। उनके व्यक्तित्व में एक ओजस्विता है, और उसी अनुपात में एक मधुरता भी, विधि की सटीक तार्ककिता है तो सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति का प्रतिबिम्ब भी।

न्यायमूर्ति श्री गुप्त जी का जन्म उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले इटावा में एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में दिनांक १५ जुलाई, १९३० को हुआ था। आपने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा इटावा नगरी में पूर्ण करने के उपरान्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक एवं फिर विधि स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र के रूप में ही प्रेम शंकर जी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ गये। आपने विधि को सच्चे हृदय से अपनाया और पूरी लगन के साथ वर्ष १९५१ से विधि व्यवसाय में वकील के रूप में अपनी गृह नगरी इटावा में कार्य प्रारम्भ किया, और वर्ष १९६२ में अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हुए। कुछ ही समय में उन्होंने अधिवक्ता के रूप में अपनी एक विशेष पहचान बना ली। उत्तर प्रदेश सरकार ने आपको वर्ष १९६४ में जिला शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) जनपद इटावा नियुक्त किया। जिस पद पर आप वर्ष १९७१ तक कुशलता से कार्य करते रहे।

उन्नीस सौ सत्तर के दशक के प्रारम्भ में श्री गुप्त जनपद इटावा में भरी पूरी वकालत छोड़कर उच्च न्यायालय इलाहाबाद में वकालत करने आये तो उस समय उच्च न्यायालय में अंग्रेजी का ही प्रभुत्व था और कोई सोच भी नहीं सकता था कि उच्च न्यायालय में हिन्दी में भी बहस हो सकती है, लेकिन श्री गुप्त जी ने यह प्रमाणित किया कि प्रतिभा किसी विशेष भाषा की मोहताज नहीं है और निज भाषा में की गयी अभिव्यक्ति अंग्रेजी में किये गये तर्कों से अधिक प्रभावशाली हो सकती है।

शीघ्र ही गुप्त जी को उत्तर प्रदेश शासन ने उपशासकीय अधिवक्ता, उच्च न्यायालय इलाहाबाद, फिर शासकीय अधिवक्ता खण्ड पीठ लखनऊ व बाद में शासकीय अधिवक्ता उच्च न्यायालय इलाहाबाद नियुक्त किया। इस पद पर आप निरन्तर १९७१ से १९७७ तक कार्यरत रहे। इस कार्यकाल में केन्द्रीय जॉच ब्योरो के स्पेशल काउन्सिल के रूप में आपने वर्ष १९७४ से १९७७ तक प्रसिद्ध आनन्द मार्गी केस (पी.सी. सरकार) की पटना सत्र न्यायालय में अभियोजन पक्ष की ओर से पैरवी की, तत्पश्चात वर्ष १९७७ में वरिष्ठ विशेष अधिवक्ता के रूप में ललित नारायण मिश्र हत्याकाण्ड में अभियोजन पक्ष को कुशलता से प्रस्तुत किया। इससे पूर्व श्री गुप्त ने फौजदारी के प्रसिद्ध केस शमीम रहमानी की अपील में उच्च न्यायालय इलाहाबाद में राज्य की ओर से पैरवी अपने तर्कों को हिन्दी भाषा में प्रस्तुत करके की थी जिसे उच्च न्यायालय में स्मृत किया जाता है।

भारत गणराज्य के राष्ट्रपति ने आपके विधिक दृष्टिकोण व मौलिक ज्ञान को ध्यान में रखते हुए आपको दिनांक १७.११.१९७७ को इलाहाबाद उच्च न्यायालय का स्थाई न्यायाधीश नियुक्त किया। आप इस पद पर अपनी सेवानिवृत्ति १४.०७.१९९२ तक बने रहे। इस बीच कुछ समय के लिए आप दो बार कार्य वाहक मुख्य न्यायाधीश भी रहे। विधि क्षेत्र की इस यात्रा का वर्णन आपके हिन्दी प्रेम को दर्शाये बिना निश्चित रूप से अपूर्ण ही है। न्यायमूर्ति के रूप में आपका राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रति योगदान अमूल्य रहा है। आपने उच्च न्यायालय में परम्परागत अंग्रेजी में निर्णय देने की परिपाटी से अलग हठते हुए हिन्दी में निर्णय देना प्रारम्भ किया। हिन्दी प्रेमियों के लिए यह एक प्रेरणा का श्रोत था। परिणाम स्वरूप उच्च न्यायालय में जहॉ केवल अंग्रेजी भाषा में कार्य होता था, अधिवक्तागण व अधिकारियों ने हिन्दी में कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। आपने १५ वर्ष के अपने न्यायमूर्ति के कार्यकाल में लगभग ४ हजार से अधिक निर्णय राष्ट्रभाषा हिन्दी में देकर एक कीर्तिमान स्थापित किया है।

न्यायमूर्ति श्री प्रेम शंकर जी का हिन्दी प्रेम उन्हें बचपन में ही प्राप्त हो गया था। इटावा के सनातन धर्म स्कूल में जब वे अध्ययनरत थे तभी उनकी कक्षा के अध्यापक उनके गुरू स्वर्गीय श्री शिशुपाल सिंह भदौरिया ´शिशु´ ने स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय रचित अपनी भावपूर्ण एवं ओजस्वी कविताओं के माध्यम से विद्यार्थियों में राष्ट्र प्रेम एवं राष्ट्रभाषा प्रेम का जो बीज बोया उसे न्यायमूर्ति श्री गुप्त जी ने अपने जीवन में पूर्णत: आत्मसात कर लिया एवं जीवन पर्यन्त उसी में वे रम गये।

उनके प्रारfम्भक गुरू श्री ´शिशु जी´ की कविता जो उन्हें अत्यन्त व्यथित एवं स्पर्श करती है कुछ इस प्रकार है: ´
सुनो गौर से, तो सुनाने के काबिल
कहानी सुनाने को जी चाहता है।
किसी का नहीं हू¡ हठीला विरोधी
किसी का खरीदा हुआ भी नहीं हूँ।
न बन्दी किन्हीं वाद के बन्धनों का
जहा¡ व्योम स्वच्छन्द है मैं वहीं हूँ।
मगर संतुलन में किसी की परिस्थिति
जहां चोट खाई हुई देखता हूँ,
कफन में वहीं लाल छीटें छिड़क कर
पताका उड़ाने को जी चाहता है।
सुनो गौर से तो, सुनाने के काबिल
कहानी सुनाने को जी चाहता है।´

स्वर्गीय शिशु जी के साथ आदरणीय श्री वल्लभ जी का सानिध्य भी न्यायमूर्ति श्री गुप्त जी को अपने स्कूल सनाधर्म में प्राप्त हुआ। श्री गुप्त, ´वल्लभ जी´ की देश प्रेम की निम्न कविता से अत्यन्त प्रभावित होकर स्वतन्त्रता के आन्दोलन में भी सम्मलित हुये,
´प्रिय विदा दो, मुक्त करो अब
मुझको इस मुज बन्धन से।
मेरा हृदय फटा जाता है,
मात्र भूमि के क्रन्दन से,
तुम्हीं कहो जब युद्ध छिड़ा हो,
चारों ओर देश भर में,
तब युवकों को शोभा देता,
क्या बैठे रहना घर में।

पीना है यह प्याला मुझको,
रस न सही विषधार सही,
मुझे किसी को कंठ लगाना,
तुम न सही तलवार सही।
सुनो बज रही है रणभेरी,
कोलाहल ध्वनि छाई है,
जीवित रहे मिलेंगे तो फिर,
अथवा यही विदाई है।´

अपनी जन्म स्थली इटावा से न्यायमूर्ति श्री गुप्त का विशेष लगाव है। इटावा नगरी ने राष्ट्र को अनेकों कवि एवं विद्वान दिये हैं। उन्हीं के प्रभाव एवं निकटता से श्री गुप्त जी का राष्ट्र प्रेम एवं राष्ट्रभाषा प्रेम जागृत हुआ। इटावा ही में जन्मे गंग कवि अकबर के दरबारी कवि थे और कवि रहीम के घनिष्ठ मित्र थे। ऐसी गंगा जमुनी सभ्यता वाले वातावरण एवं गुरूओं का सानिध्य पाने वाले न्यायमूर्ति श्री प्रेम शंकर जी उर्दू कविता के भी बड़े रसिक तथा प्रेमी हैं। उनकी उर्दू जुबान एवं तहजीब उर्दू जगत में उन्हें विशिष्ट पहचान देती है। वे भारतीय संस्कृति एवं साहित्य की एक अमूल्य निधि है।

राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर कहते थे कि हिन्दी को अभी सम्मान मिलना शेष है। हिन्दी को खून की नहीं पसीने की आवश्यकता है तभी उसकी वास्तविक प्रगति सम्भव हो सकती है। प्रेम शंकर जी के द्वारा इस ओर किया गया परिश्रम सराहनीय है। हिन्दी में निर्णय देने के अपने अद्भुत कार्य के अलावा आपका यह मानना रहा है कि विधि क्षेत्र में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग स्वछन्द एवं कृत्रिम रूप से हो। हिन्दी के बहुत से fक्लस्ट शब्दों का व्यर्थ में प्रयोग करना उचित नहीं है। सेवानिवृत्ति के पश्चात आप सर्वस्व रूप से हिन्दी के उत्थान और उसके सम्मान की रक्षा में तन मन धन से लग गये। आपकी इस हिन्दी सेवा से अभिभूत हो उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा आपको वर्ष १९९२ में ´हिन्दी गौरव´ से सम्मानित किया गया। वर्ष १९९३ में अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद द्वारा आपको ´साहित्य वाचस्पति´ की मानध उपाधि दी गयी। इसी कड़ी में आपको वर्ष १९९८ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा ´पंडित श्री नारायण चतुर्वेदी सम्मान´ भी प्रदान किया गया। उत्तर प्रदेश शासन द्वारा हिन्दी भाषा के उन्नयन एवं सराहनीय सेवा के उपलक्ष में आपको ´महामना मदन मोहन मालवीय सम्मान´ से नवाजा। महामहिम राज्यपाल उत्तर प्रदेश आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री द्वारा सितम्बर २००० में ´तुलसी सम्मान´ तुलसी पीठ एवं शोध संस्थान के समारोह में प्रदान किया गया। आपको रामायणम् न्यास अयोध्या द्वारा एवं हिन्दी विधि प्रतिष्ठान द्वारा भी ´सारस्वत सम्मान व विशिष्ठ राज्य भाषा सम्मान´ से विभूषित किया गया।

न्यायमूर्ति प्रेम शंकर जी ने वर्ष १९९२ में जब उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ´हिन्दी गौरव´ सम्मान से विभूषित किया गया तो उसके साथ पुरस्कृत ५१ हजार की धनराशि में उन्होंने अपने ओर से २० हजार रूपये मिलाकर ´इटावा हिन्दी सेवा निधि´ की स्थापना हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के प्रसार, प्रचार, समृद्धी एवं उत्थान व हिन्दी के मनीषियों को पुरूस्कृत करने हेतु की। यह संस्था विगत १४ वर्षों से आपके कुशल दिशा निर्देश में सफलता के कई सोपान पार कर चुकी है।

न्यायमूर्ति गुप्त जी अपने निराले व्यक्तित्व के लिए जाने और पहचाने जाते हैं। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी है चाहे वह हिन्दी हो, या विधि क्षेत्र हो, साहित्यिक हो, संस्कृति हो, धार्मिक हो या सामाजिक। आपने हमेशा ही अपनी सरल, साहिfत्यक व ओजस्वी वाणी से हर कार्यक्रम में जनता को हिलोर कर रखा है। परिणाम स्वरूप आपको सर्वव्यापी लोकप्रियता मिली है।

मैं ऐसे सरस्वती पुत्र, हिन्दी के समर्पित वन्दनीय श्रद्धेय माननीय न्यायमूर्ति प्रेम शंकर जी गुप्त को हृदय से नमन और कोटि कोटि प्रमाण करते हुए प्रभू से उनकी दीर्घ आयु व स्वस्थ्य जीवन की कामना करता हूं।

Friday, December 01, 2006

पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को दाखिला कैसे मिला

{पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एम.एस.सी. (भौतिक शास्त्र) में दाखिला लिया था। प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैइया) बता रहे हैं कि उन्हें दाखिला कैसे मिला था।

यह लेख, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुरातन छात्रों की पत्रिका, Under the banyan tree, के जनवरी १९९०- अप्रैल १९९० के अंक नम्बर १८-१९ में 'अपना विश्वविद्यालय, प्यारा विश्वविद्यालय' नाम के शीर्षक से छपा था। यह लेख रज्जू भैया से की गयी बातचीत पर आधारित था। यहां पर वह लेख उस पत्रिका के सौजन्य से छापा जा रहा है। पिछली कड़ी में हमने इसी पत्रिका से प्रो. हरीश्चन्द्र के बारे में, रज्जू भैया से की गयी बातचीत पर आधारित, लेख छापा था।

आपको इस लेख को कौपी करने, बांटने, या वीकिपीडिया पर डालने की अनुमति है पर अच्छा हो कि यह करते समय आप इसका श्रेय इलाहाबाद पुरातन छात्र संघ इलाहाबाद या पत्रिका Under the banyan tree को दें या इस चिट्ठी का लिंक दे दें।}

श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एम.एस.सी. के विद्यार्थी रहे हैं। वे १९६२ में यहॉं पर दाखिला लेने के लिये आये और मुझसे मिले। उन्होंने पूना यूनिवर्सिटी से बी.एस.सी. की परीक्षा में ६६% अंक प्राप्त किये थे तथा उनकी दूसरी पोजीशन थी। मैंने उनसे कहा कि हम बाहर के विश्वविद्यालय के तो ७०% से अधिक पाने वाले छात्र को ही लेते हैं। और अपने ही विश्वविद्यालय के प्रथम श्रेणी के लोगों को लेते हैं। ऐसी अवस्था में उनके दाखिले में कठिनाई आयेगी। उन्होंने हंसते हुए कहा कि,
'मैं तो आप ही के शहर का हूं। मैंने कायस्थ पाठशाला में प्रेक्टिकल का अभ्यास करके इण्टरमीडिएट विज्ञान से पास किया। और क्योंकि यहॉं पर मेरे मित्र लोग नहीं थे इसलिये मैं पूना विश्वविद्यालय पढ़ने के लिये चला गया। पूना विश्वविद्यालय तो बड़ी कठिनाई से अंक देता है। मेरी दूसरी पोजीशन होने के बाद भी मुझे ६६% अंक मिले और प्रथम पोजीशन प्राप्त करने वाले को ६७% अंक मिले। मैं यहॉं बड़ी रूचि के साथ पढूँगा।'
मैंने कहा,
'ठीक है इतनी रूचि है तो आपको तो जरूर दाखिला देंगे पर मुझे भरोसा नहीं है कि आप एम.एस.सी. कर ले जायेंगे।'
उन्होंने कहा,
'आप ऐसा क्यों कहते हैं?'
मैंने कहा,
'आप ऐसे घराने के व्यक्ति हैं कि राजनीति आपको जल्दी से खींच लेगी और किसी न किसी कारण से आप चुनाव के चक्र में फंस जायेंगे।'
हुआ भी ऐसा ही। उसी साल संतबख्श सिंह, जो उनके भाई थे वे लोकसभा के लिये खड़े हुये और उनके चुनाव प्रचार करने के लिये हमारे विश्वनाथ प्रताप सिंह को जाना पड़ा।

Saturday, November 18, 2006

प्रो. हरीश्चन्द्र (१९२३-८३)

(२०वीं शताब्दी में दो प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ हुये हैं: इस शताब्‍दी के पहले भाग में रामानुजम तथा दूसरे भाग में हरिश्चन्द्र। हरिश्चन्द्र का जन्म ११ अक्टूबर १९२३ को कानपुर में हुआ था और उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में। ऐसा कहा जाता है कि हरिश्चन्द्र ने एम.एस.सी. गणित में प्रवेश इसलिये नहीं लिया क्योंकि उन्होंने बी.एस.सी. में ही एम.एस.सी. गणित की सारी पढ़ाई पूरी कर ली थी। यहां से वे होमी जहांगीर भाभा के साथ कैम्ब्रिज चले गये और वहां से प्रिंक्स्टन विश्वविद्यालय अमेरिका। १९५४ में उन्हें कोल पुरुस्कार से नवाजा गया। उनकी मृत्यु १६ अक्टूबर १९८३ को प्रिंक्स्टन न्यू जर्सी अमेरिका में हो गयी। इनके बारे यहां , और यहां भी पढ़ा जा सकता हैं और इनका चित्र यहां देखा जा सकता है। इलाहाबाद में गणित एवं भौतिक शास्त्र का प्रसिद्ध केन्द्र मेहता रिसर्च इन्सटिट्यूट के नाम से है। इसका अब नाम बदल कर हरीश्चन्द्र रिसर्च इन्सटिट्यूट कर दिया गया है।

प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैइया) इलाहाबाद विश्वविद्यालय में १९३९ से १९४३ तक विद्यार्थी, तथा उसके पश्चात१९६७ तक भौतिकी विभाग में अध्यापक रहे। इस बीच उन्होंने जितना इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पाया शायद उससे कहीं अधिक उसे वापस किया। विश्वविद्यालय तो उन्हें छोड़ना नहीं चाहता था पर समाज सेवा का अधिकार शायद अधिक था। १९६७ के बाद, मृत्यु तक वे इसी में संलग्न रहे।

रज्जू भैया और हरिश्चन्द्र बी.एस.सी. और एम.एस.सी. (भौतिक शास्त्र) में सहपाठी थे। Under the banyan tree इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुरातन छात्रों की पत्रिका है। इसके जनवरी १९९०- अप्रैल १९९० के अंक नम्बर १८-१९ पर हरीशचन्द्र एवं भूतपूर्व प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के बारे में एक लेख 'अपना विश्वविद्यालय, प्यारा विश्वविद्यालय' नाम के शीर्षक से छपा था। यह लेख रज्जू भैया से की गयी बातचीत पर आधारित था। यहां पर हरीश्चन्द्र के बारे में वही लेख उस पत्रिका के सौजन्य से छापा जा रहा है। अगला लेख भूतपूर्व प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के बारे में रहेगा।

आपको इस लेख या रज्जू भैइया के चित्र को कौपी करने, बांटने, या वीकिपीडिया पर डालने की अनुमति है पर अच्छा हो कि यह करते समय आप इसका श्रेय इलाहाबाद पुरातन छात्र संघ इलाहाबाद या पत्रिका Under the banyan tree को दें या इस चिट्ठी की लिंक दे दें।)

मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिये १९३९ में आया। उस समय देश के कोने-कोने से बड़े लोग पढ़ने के लिये यहीं आते थे। मेरे सहपाठियों में भी रामचरन मेहरोत्रा जो बाद में वाइस चान्सलर रहे और बहुत बड़े केमिस्ट। डा. चन्द्रिका प्रसाद जो कि गोरख प्रसाद जी के लड़के थे, और बाद में रूड़की यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे। डा. हर नारायण और डा. हरिश्चन्द्र भी विद्यार्थी अवस्था में हम लोगों के साथ थे। हमारे गुरूजनों का हम पर बड़ा स्नेह था। हम बड़े खुलकर उनसे बातचीत कर सकते थे। हरिश्चन्द्र जी हमारे प्रदेश के एक इन्जीनियर श्री चन्द्र किशोर जी के सुपुत्र थे। मेरे पिता जी के इन्जीनियरिंग डिपार्टमेण्ट में होने के कारण हम पहले से ही एक दूसरे को जानते थे। हरिश्चन्द्र के भाई साहब सतीशचन्द्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.एस.सी. (फिजिक्स) करके के बाद आई.सी.एस. में आये थे। इसलिए उनसे भी परिचय था।

हरिश्चन्‍द्र से अधिक परिचय उस दिन हुआ जब मैं हॉस्टल में उनसे एक दिन मिलने गया। उन्हें १०४ डिग्री का बुखार आया हुआ था। इस पर भी वह बड़ी भारी गणित कर रहे थे। मैंने उनसे कहा,
'भाई आराम करो।'
उन्होंने कहा,
'कुछ गणित करते रहते हैं तो बुखार का दर्द और ज्वर की अन्य तकलीफें भूल जाता हूँ और अगर आराम करूँगा तो फिर ज्वर की कठिनाइयॉं भी सामने आयेंगी।'
गणित उनका बड़ा प्रिय विषय था। हम लोगों से काफी आगे की गणित वह जानते थे। उन्हें रिलेटिव्टी के सिद्धान्त के बारे में पढ़ने का शौक था और वह इसका अध्ययन करते रहते थे। गणित में हमें जब समस्या होती थी तो हम लोग उनसे पूछ लेते थे। बी.एस.सी. में हम सब पोजीशन होल्डर थे। और फिर हम तीनों विभागों में बँट गये। फिजिक्‍स में हरिश्चन्द्र और मैं एक दूसरे से ऊपर नीचे वाले पोजीशन लिये हुये थे। एम.एस.सी. में हम लोगों के साथ आगरा विश्वविद्यालय का फर्स्ट क्लास फर्स्ट, दिल्ली विश्वविद्यालय का फर्स्ट क्लास फर्स्ट ऐसे अनेक लोग थे। मुझे बहुत प्रसन्नता थी कि एम.एस.सी. के प्रथम तथा अन्तिम साल दोनों में वे प्रथम और मैं द्वितीय रहा। धोखे से अगर कहीं मैं प्रथम आ जाता तो बड़ा मानसिक कष्ट होता।

उस समय हमें पढ़ाने वालों में डा. कृष्णन्न थे। शायद ऐसा पढ़ाने वाला दूसरा हम लोगों ने नहीं देखा। इतने ज्ञानी होने के बाद भी हम लोगों को पढ़ाने के लिए खूब तैयारी करके आते थे। परन्तु फिर भी आधुनिक गणित से उतने अभ्यस्त न होने के कारण हरिश्चन्द्र कभी न कभी उनको परेशानी में डाल देता था। सवाल के हल में कहां कमी रह गयी, उसमें कहां दोष रह गया परन्तु यह बतलाने के कारण से व किसी कारण से वह अप्रिय नहीं था। हमारे कृष्णनन साहब उस पर बड़ा स्नेह रखते थे। सर सी.वी.रमन, कृष्णन्न साहब के गुरू भी रहे थे। इस कारण वह भी आते रहते थे। और उनके भाषण हम लोगों को बहुत ही उत्साहप्रद लगते थे। प्रतिवर्ष उनका आना भी हम लोगों के लिये एक प्रकार का उत्सव जैसे ही था। डा. भाभा भी एक बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय देखने के लिये आये थे। डा. भाभा एक थ्योरिटीशियन थे। उन्होंने तभी कास्मिक किरणों के सम्बन्ध में भाभा - हिटलर सिद्धान्त निकाला था।उस समय उनकी उम्र ३४-३५ साल की रही होगी। वे एफ.आर.एस. हो गये थे। हमारी लेबोरेटरी एक्सपेरीमेंटल ही थी। उसे देखकर उनको कुछ हेड होने की इच्छा नहीं हुई। इसलिये वे वापस चले गये। उनके लेक्चर भी हुये परन्तु हम लोगों को उनसे अधिक क्षमतावान अपने डा. कृष्णन्न ही लगते रहे।

मेरी एम.एस.सी. की परीक्षा में सर सी.वी.रमन हमारे थ्योरी तथा प्रैक्टिकल के दोनों के परीक्षक थे। थ्योरी का पेपर कुछ कठिन था। प्रोफेसर रमन ने हरिश्चन्‍द्र को १०० में से १०० नम्बर दिये। साथ ही साथ एक भाषण में बाद में कहा, पहले दो विद्यार्थी तो इतना जानते हैं कि जितना मैं भी नहीं जानता हूं। मैंने पहले विद्यार्थी को १०० में १०० दे दिये तो मुझे लगा कि यदि मैं दूसरे को १०० में १०० देता हूं तो शायद लोग समझेंगें कि रमन बुद्धि से कमजोर हो गये हैं। इसलिये दूसरे को मैंने थोड़े कम नम्बर दिये हैं। प्रैक्टिकल में भी बड़ा आनन्द आया क्योंकि मुझे रमन इफेक्ट करने के लिए मिला। प्रो. रमन मेरा इफेक्ट देखने के लिए आये। मैंने एक फोटोग्राफ ले लिया था, उन्हें दिखाया। कृष्णन्न साहब के साथ रहने के कारण मैं थोड़ा हिम्मत वाला भी बन गया था। रमन साहब से कोई इतना डरता या घबराता नहीं था। उन्होंने पूछा क्यों, यह कौन सा पदार्थ है। मैंने कहा ये बेंजीन है। उन्होंने हँसते हुये कहा नहीं यह कार्बन टेट्राक्लोराइड है। तुम कैसे और किस आधार पर कहते हो कि बेंजीन है ? मैंने कहा मुझे प्रो. कृष्णन्न ने बताया है। उन्होंने अट्टाहास करते हुये कृष्णनन साहब को बुलाया और कहा,
'देखों यहॉं एक विद्यार्थी है कि जो तुम पर मुझसे भी ज्यादा विश्वास करता है।'
मेरे लिये फोटोग्राफस को देखकर उनके मन में बड़ा स्नेह उत्पन्न हुआ और उन्होने कहा कि तुम आगे रिसर्च करने के लिये बंगलौर आना चाहो तो तुम्‍हारे लिये खुली छूट है। हरिश्चन्द्र ने थ्योरी का पेपर तो अच्छा किया था परन्तु प्रैक्टिकल में उनके हाथ से ग्रेटिंग गिर गयी थी। वैसे भी वे प्रैक्टिकल फिजिक्स के विशेषज्ञ नहीं थे परन्तु कृष्णनन साहब ने ग्रेटिंग वगैरह फिर से सेट कराके रमन साहब से कहा कि यह हमारे यहॉं का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी है थोड़ा सा हड़बड़ा गया है। रमन साहब ने २-४ सवाल पूछ कर और एक मोटी सी लाइन देखकर उनको अच्छे नम्बर दे दिये।

इलाहाबाद से पास करने के बाद हरिश्चन्द्र डा.भाभा के पास काम करने के लिये गये। मैंने भी कृष्णनन साहब से एक दिन दबी जुबान से रमन साहब के पास जाने की बात की तो कृष्णनन साहब हँसते हुये कहा कि मेरे साथ कौन काम करेगा? फिर मैं इलाहाबाद ही रूक गया। भाभा के साथ हरिश्चन्‍द्र ने उस समय तीन-तीन बड़े अच्छे पेपर्स निकाले जो रायल सोसायटी में छपे। और उन्हीं पेपर्स के आधार पर लेक्चर देने के लिये जब भाभा इंगलैण्ड गये तो वे हरिश्चन्द्र को अपने साथ ले गये कि जिससे अगर किसी विषय पर पूछ-ताछ हो तो हरिश्चन्द्र के साथ उस विषय पर ठीक प्रकार से उत्तर दिया जा सके। वहीं हरिश्चन्‍द्र का सम्बन्ध डिराक से आया। वे उसकी योग्यता से प्रभावित हुये। और उसे अपने साथ इंगलैण्ड में रख लिया। डिराक के साथ वहॉं बहुत कुछ उसने स्वतन्त्र रूप से काम किया। और फिर डिराक के साथ एक लेक्चर में वे अमेरिका चले गये। वहां प्रिक्सटन में पौउली के साथ उनकी छोटी से मुठभेड़ हुई। वह भी बड़ी रोचक है। पौउली ने एक प्रश्न के विषय में कहा कि इसका हल नहीं निकाला जा सकता। हरिश्चन्द्र श्रोताओं में बैठे थे। वे तुरन्त उठकर खड़े हो गये उन्होंने पूंछा
'सर, क्‍या यह बात आप इसलिये कह रहे र्हैं कि इसका हल आप नहीं निकाल पाये।'
पौउली ने हँसते हुये कहा कि
'तुम ठीक कहते हो। न मैं इसका हल निकाल पाया, न ही मैं कोई तरीका जान पाया जिनसे इनका हल निकाला जा सके।'
तीन दिन का सेमिनार था। हरिश्चन्द्र एकदम काम में जुट गये तीसरे दिन वे पहुँचे और पौउली से कहा सर, इस समस्या का हल तो नहीं लेकर आया हूँ पर यदि हम इस तरह से चलें तो मैं समझता हूँ कि इसका हल ढूँढ़ा जा सकता है। उनका तरीका, उनकी योग्यता देखकर पौउली इतना प्रभावित हुये कि उन्होंने कहा कि क्यों नहीं तुम यहीं प्रिंक्स‍टन में काम करते। और तब से हरिश्चन्द्र जी वहीं प्रिंक्स‍टन में रह गये। और वहॉं अन्त में इन्सटिट्यूट आफ एडवान्स स्टडीज में उन्होंने आइंस्टाइन की पोस्ट प्रोफेसर आफ मैथमेटिक्स प्राप्त की।

भारत के लोग, भारत वापस लौटे, इसकी भी आवश्यकता है। इसलिये सी.एस.आई. आर. के. चेयरमैन जहीन साहब ने हरिश्चन्द्र को भारत बुलाने के लिये थ्योरिटिकल्स इंस्टिट्यूट के डाइरेक्टर के नये पद का सृजन किया। उसके लिये पहले उनको लेक्चर देने के लिये बुलाया गया। चार जगह उनके लेक्चर रखे गये। दिल्ली, बम्बई, मद्रास, कलकत्ता। पर हरिश्‍चन्‍द्र ने स्वयं कहा कि वह इलाहाबाद अवश्य जाना चाहते हैं। मैं उन दिनों इलाहाबाद में भौतिक विभाग का अध्यक्ष था। उनका लेक्चर हुआ। एक तो साधारण लोगों के लिये जिसे हम पॉप्युलर लेक्चर कहते हैं और एक शोध छात्रों के लिये। शोध छात्रों का लेक्चर तो बहुत कठिन था। हरिश्चन्द्र ने मुझसे कहा था कि
‘मैं डायरेक्टर के पद पर भारत नहीं आऊंगा। मुझे प्रशासनिक कार्य करने में बिल्‍कुल रूचि नहीं है और मैं बहुत स्पष्टवादी हूँ। सरकारी अधिकारी बहुत जल्दी नाराज हो जायेंगे।‘
मैंने उसको बहुत मनाया कि यहॉं पर भी उसे काम करने के लिये बुद्धिमान लोग मिलेंगे। आखिर हरिश्चन्द्र तो इसी देश में उत्पन्न हुआ है। परन्तु कुछ अपनी अस्वस्थता के कारण, कुछ झिझकने के कारण वह वापस चला गया। पर देश के प्रति उसकी भावना कम नहीं थी। मुझे स्मरण है कि १९६५ की लड़ाई के समय भारतवर्ष के पास विदेशी मुद्रा की कमी थी उस समय मैंने अपने एक मित्र और शिष्य डा. वी.डी. गुप्ता, जो अभी कुछ दिनों पूर्व गोरखपुर विश्वविद्यालय के वाइस चान्सलर थे तथा उस समय अमेरिका में शोध कार्य कर रहे थे, उनको हरिश्चन्द्र के पास भेजा कि वहां से विदेशी चन्दा इकट्ठा करें। हरिश्चन्द्र से मिलते ही उसने बिना कुछ कहे ही एक हजार डॉलर्स इस काम के लिये दिये और कहा कि अगर और आवश्यकता हो तो और भी ले जाना।

मैं कुछ साल पहले अमेरिका गया था। उस समय उससे बात चीत हुई थी। वे दिल के मरीज थे। मैंने मजाक में कहा,
‘मैंने तो तुम्‍हारे बहुत लेक्चर सुने हैं, तुम भी मेरा लेक्चर सुनने आओ।‘
उसने कहा,
‘मुझे हार्ट की बीमारी होने के कारण डाक्टर ने चलने फिरने को मना किया है। हार्ट बाई पास सर्जरी हो जायेगी तो उसके बाद मैं तुम्हारा लेक्चर सुनने आऊंगा।‘
परन्तु ऐसा दुर्भाग्य देश का, कि एक जादुल्यमान सितारा उसके पूर्व ही तिरोहित हो गया। वह अमेरिका का नागरिक होते हुये रायल सोसाइटी का फेलो बना। किसी विदेशी को फेलोशिप आफ दि रोयल सोसायटी देना एक बहुत बड़ा सम्मान है। उसका काम तो ऐसा नहीं था जो नोबुल पुरस्कार की श्रेणी में आता हो क्योंकि वहां तो समाज के भविष्य के हित में काम आंका जाता है और गणित में नोबुल पुरूस्कार मिलता भी नहीं। पर हरिश्चन्द्र का काम गणित में बड़े उच्च कोटि का था। मुझे कई नोबुल पुरूस्कृत लोगों से मिलने और उनका काम देखने का मौका मिला। मेरा विश्वास है कि हरिश्चन्द्र का काम उसी श्रेणी में आता है। उनकी मृत्यु विज्ञान जगत के लिये और हम भारतीयों के लिये बड़े भारी दुख का विषय है।

Saturday, November 11, 2006

जयंत विष्णु नार्लीकर

(यह लेख कृष्णा वीरेंद्र न्यास के सौजन्य से है। आपको इस लेख की कौपी करने, बांटने, या वीकिपीडिया पर डालने की अनुमति है। हमें तथा न्यास को अच्छा लगेगा यदि आप यह करते समय इसका श्रेय कृष्णा वीरेंद्र न्यास को दें या इस चिट्ठी का लिंक दे दें। )

जयंत विष्णु नार्लीकर (नार्लीकर) का जन्म १९जुलाई १९३८ को कोल्हापुर माहाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता विष्णु वासुदेव नार्लीकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) में गणित के अध्यापक थे तथा मां संस्कृत की विद्वान थीं।

नार्लीकर की प्रारम्भिक शिक्षा बनारस में हुई। बी.एच.यू. से बी.एस.सी. की ड्रिग्री लेने के बाद वे कैम्ब्रिज विश्विद्यालय चले गये। उन्होने कैम्ब्रिज से गणित की डिग्री ली और खगोल-शास्त्र एवं खगोल- भौतिकी में दक्षता प्राप्त की।

आजकल यह माना जाता है कि ब्रहमांड की उतपत्ति बिग बैंग के द्वारा हुई थी पर इसके साथ साथ ब्रहमांड की उतपत्ति के बारे में एक और सिद्धान्त प्रतिपादित है, जिसका नाम स्टेडी स्टेट सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के जनक फ्रेड हॉयल हैं। अपने इंगलैंड के प्रवास के दौरान, नार्लीकर ने इस सिद्धान्त पर फ्रेड हॉयल के साथ काम किया।

१९७० के दशक में नार्लीकर भारतवर्ष वापस लौट आये और टाटा रिसर्च इन्सटिट्यूट में कार्य करने लगे। १९८८ में विश्विद्यालय अनुदान आयोग के द्वारा उन्हे Inter-University Centre for Astronomy and Astrophysics (IUCAA) सथापित करने का कार्य सौपा गया। उन्होने यहां से २००३ में अवकाश ग्रहण कर लिया। अब वे वहीं प्रतिष्टित अध्यापक हैं। अपने जीवन के सफर में, नार्लीकर को अनेक पुरुस्कारों से नवाज़ा गया। इन पुरुस्कारों में प्रमुख हैं: स्मिथ पुरुस्कार (१९६२), पद्म भूषण (१९६५), एडम्स पुरुस्कार (१९६७), कलिंग पुरुस्कार (१९६६) शांतिस्वरूप पुरुस्कार (१९७९), और पद्म विभूक्षण (२००४)।

नार्लीकर न ही केवल विज्ञान में किये कार्य के लिये जाने जाते हैं पर वे विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में भी पहचाने जाते हैं। उन्हे अक्सर टीवी या रेडियो पर विज्ञान के लोकप्रिय भाषण देते हुऐ या फिर विज्ञान पर सवालों के जवाब देते हुए देखा एवं सुना जा सकता है।

नार्लीकर ने न केवल विज्ञान से सम्बन्धित अकल्पित (non-fiction) पुस्तकें लिखी हैं पर विज्ञान से सम्बन्धित कल्पित (fiction) पुस्तकें भी लिखी हैं। यह सारी पुस्तके अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी के साथ कई अन्य भाषाओं में हैं। धूमकेतु नामक पुस्तक, विज्ञान से सम्बन्धित की छोटी छोटी कल्पित कहानियों का संकलन है। यह हिन्दी में है। इसकी कुछ कहानियां मराठी से अनुवाद की गयी हैं। यह कहानियां विज्ञान के अलग अलग सिद्धान्त पर आधारित हैं। The Return of Vaman उनके द्वारा लिखा हुआ विज्ञान का कल्पित उपन्यास है। इस उपन्यास की कहानी भविष्य की एक घटना पर आधारित है, जिसके ताने-बाने में भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा, बहुत सुन्दर तरीके से समायोजित है। यह दोनो पुस्तकें सरल भाषा में, विज्ञान को सरलया से समझाते हुऐ, लिखी गयी हैं। यदि आपने कभी भी विज्ञान नहीं पढ़ा है तब भी आप इसे आसानी से समझ सकेगें। एक बार शुरु करने के बाद आप इन्हें छोड़ नहीं पायेंगे। नार्लीकर के द्वारा लिखी अथवा सम्पादित पुस्तकों की सूची यहां है।

नार्लीकर ने बहुत समय बी.एच.यू. में बिताया है उन्ही में से कुछ लम्हों को वे यहां यादों की दूरबीन से देख रहें हैं। यह लेख हिन्दी में लिखा है और आप चाहे बी.एच.यू. में पढ़े हों या नहीं, चाहे वहां गये हों या नहीं, आपको यह पढ़ कर अच्छा लगेगा।

Tuesday, October 24, 2006

पौत्री का बाबा से मिलन


{यह लेख कृष्णा - वीरेन्द्र न्यास के द्वारा लिखा गया है। श्री मितुल पटेल की टिप्पणी पर न्यास के द्वारा यह बताया गया है कि किसी को भी को इस लेख को बाटने, संशोधन करने अथवा वीकिपीडिया पर रखने की स्वतंत्रता है उन्हे अच्छा लगेगा यदि इसका श्रेय इस पोस्ट को या न्यास को दिया जाय}
न्यायमूर्ति एम.सी. देसाई
मुन्नीलाल चुन्नीलाल देसाई का जन्म १९०४ में नडिआड़ गुजरात में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा वहीं के स्कूल में और उच्च शिक्षा एलफिंस्टन विद्यालय बम्बई और बड़ौदा विश्वविद्यालय। उनके बडे भाई, महाराजा बड़ौदा से पैसा लेकर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढने के लिये गये और मुन्नीलाल को भी वहीं पर पढने के लिये बुला लिया। मुन्नीलाल अपने बडे भाई की तरह भारतीय सिविल सेवा में बैठे और सफल रहे। १९२६ में उनकी नियुक्ति सहायक कलक्टर के रूप में उत्तर-प्रदेश में हो गयी। १९४१ मे जब वे कलक्टर के पद पर थे तो उन्हें अकारण वहां से स्थानान्तरित कर दिया गया। इसका कारण पूछने पर अंग्रेज आयुक्त ने बताया कि कि किसी बाहर के प्रदेश के हिन्दू व्यक्ति का उत्तर प्रदेश में कलक्टर के पद पर रहना ठीक नहीं है। इससे उन्हें लगा कि प्रशासनिक सेवा उनके लिये ठीक नहीं है और उन्होंने अपने आप को न्यायिक सेवाओं में स्थानान्तरित कराने के लिये विकल्प दे दिया। उस समय भारतीय सिविल सेवा के लोग न्यायिक सेवा में आ सकते थे। १९४२ में उनकी नियुक्ति अपर जनपद न्यायाधीश के रूप में हो गयी। यहीं से उनका न्यायिक सफर शुरू हुआ। १३ दिसम्बर १९४८ को वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने और १७ फरवरी १९६१ को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने। वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सिविल सेवा से बनने वाले पहले मुख्य न्यायाधीश थे। न्यायमूर्ति देसाई की छवि एक ईमानदार तथा खरे जज के रूप में है। वे सख्त जज थे और फौजदारी के मुकदमे में सजा करने वाले जज के रूप में जाने जाते थे। न्यायमूर्ति देसाई सार्वजनिक भाषण देने में शर्माते थे, इसलिये जब उन्होने मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला तो उनके स्वागत समारोह पर महाधिवक्ता कन्हैया लाल मिश्र ने कहा (१९६१ इलाहाबाद लॉ जरनल, जरनल भाग १८),
'My Lord, there has been on occasions a noticeable tendency on your Lordship's part to be shy of speech. I am afraid there would be occasions outside the Court when there would be repeated demands which are likely to wreck that silence. It is not merely an apprehension but a promise. But we are absolutely certain that in the coming years you and Mrs. Desai will continue in a larger field with a vaster influence the social charm that you have already been shedding over the life of Allahabad.'
श्री मिश्र कि यह भविष्यवाणी सच निकली। स्वतंत्रता के बाद के इलाहाबाद जीवन मे उन्होने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। न्यायमूर्ति देसाई पार्टियों और ताश के शौकीन रहे। ताश में ब्रिज और पोकर उनके प्रिय खेल थे। उनकी पत्नी कभी-कभी मजाक करती थी कि शायद ताश के प्रेम के कारण वे सर्वोच्च न्यायालय नहीं जा पाये। वे स्वयं भी ब्रिज के अच्छे खिलाडी थे। न्यायमूर्ति राम मनोहर सहाय ने अपनी जीवनी लिखी है इसमें वे बताते हैं,
'As a part of Republic Day celebrations, cricket match used to be held between the Bar and Bench. Once, when MC Desai, ICS was the Chief Justice it rained heavily. Therefore, it was decided that a bridge match be held between the bar and the bench. Sharmaji sent his car, got me picked and we played against the top table of MC Desai and V Bhargava. Both were ICS and retired as Chief Justices of the Court. They were very good players of bridge.' (A Lawyer's Journey published by Universal Law Publishing Company Delhi)
न्यायमूर्ति देसाई को मैदान में खेले जाने वाले खेल भी बेहद पसन्द थे। गोल्फ के शौकीन थे। गर्मी में हमेशा पहाड़ो पर रहना, हाईकिंग करना उन्हें पसन्द था। उनका प्रिय हिल स्टेशन डलहौज़ी था। न्यायमूर्ति देसाई मेहमाननवाजी में विश्वास करते थे और मेहमानों को स्वयं परोसकर खिलाने में प्रसन्न रहते थे। सुख्खू उनका खानसामा था वह बचपन से ही न्यायमूर्ति देसाई के साथ आ गया था। वह खाना बहुत अच्छा बनाता था और अपनी मृत्यु तक, न्यायमूर्ति देसाई के साथ रहा। पार्टियों मे उसका हाथ बटाने निकेल्स नाम का एक और खानसामा आ जाता था। न्यायमूर्ति देसाई बहुतों को जानते थे और उनकी खास बात यह थी कि वे सबको पहले नाम से पुकारते थे - आत्मीयता की इससे अच्छा क्या उदाहरण हो सकता है। अन्त समय में उनके आंख की रोशनी कम हो गयी, ठीक से दिखना बंद हो गया। इस कारण कई लोग उनसे मिलते समय अपना नाम बताते थे। उन्हें अच्छा नहीं लगता था क्योंकि वे सोचते थे कि वह व्यक्ति आंख की रोशनी कम होने के कारण सहानुभूति दिखा रहा है। वे हमेशा कहते थे कि उन्हें खुशी है कि आखों में कुछ रोशनी तो बाकी है। आंख की रोशनी कम हो जाने के बाद भी वे लोगों को उनकी आवाज से पहचान कर, उनके पहले नाम से ही बुलाते थे। अन्त समय में वे ताश आतशी शीशे की सहायता से देख कर खेलते थे। वे शराब के भी शौकीन थे पर हमेशा दायरे के अन्दर। उनकी पार्टियों में, शराब पीने वाले और न पीने वालों का बराबर ध्यान रखा जाता था जो कि अक्सर आजकल की पार्टियों में नहीं होता है। यदि आप शराब नहीं पीते है और ऐसी पार्टी मे फंस जाये तो शामत ही समझिये, मालुम नही कब खाना मिले और बीच में तो सब ठन-ठन गोपाल। यह भी खास बात थी यदि आप शराब नहीं पीते थे तो तो उन्होंने इसका आदर किया कभी शराब पीने के लिये नहीं कहा। न्यायमूर्ति राम मनोहर सहाय अपनी जीवनी में कहते हैं कि,
' Drinks in those days particularly when MC Desai was the Chief Justice was very common in dinners and parties. So much so that once when we had become better known, Jagdish Swaroop was astonished to find that KC Agrawal and I were moving in the Republic Day lunch without any glass. He told us that it was still not late to being taking drinks, otherwise he would never be Judges of the Court.' (A lawyer's journey: published by Universal law publishing company Delhi)
क्या मालुम, उस समय शायद जज़ बनने के लिये शराब का सेवन करना महत्वपूर्ण था। यह वाक्या तो सही होगा पर यह बात ठीक नहीं लगती। इलाहाबाद में बहुत से ऐसे लोग भी जज बने, जो शराब छूते भी नहीं थे। न्यायमूर्ति देसाई ने अधिकतर उन लोगों के नामों की सिफारिश की, जो शराब नहीं पीते थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय अपने में अनूठा है। सारे न्यायालयों मे इसका अपना क्लब है जिसमें हर शुक्रवार को आज उनकी पति या पत्नियां ही आ सकते हैं। इसके नियम इतने कठोर हैं कि इसमें उनके बच्चे भी नहीं जा सकते हैं। न्यायमूर्ति देसाई जब तक जीवित रहे, हर शुक्रवार को क्लब पहुंचना इनका नियम था। चार लोग मिल गये तो ब्रिज खेल लिया, नहीं तो मिल बैठ कर गपशप की। न्यायमूर्ति देसाई को कभी इस बात का दुख नहीं हुआ कि उन्होने प्रशासनिक सेवा छोडकर न्यायिक सेवा अपनायी। उन्होने अपना २४ फरवरी १९६६ को मुख्य न्यायाधीश का पद छोडते समय कहा (१९६६ इलाहाबाद लॉ जरनल, जरनल भाग 5),
'I have never regretted the choice. How could I. The most exalted function with which a man can be entrusted is the administration of justice to his fellow being. A Judge is not a servant, not even of the King; if he is a servant at all he is a servant of the law. A practical demonstration of the English doctrine is a story told by Prof. Goodhard of two Judges who went to Oxford on assize. They went to dinner at All Souls College where after the dinner the warden proposed the health of the Queen. The junior Judge who was new stood up and the senior pulled his coat and whispered, “Sit down you fool you are the Queen.'
वे किस तरह के जज थे उन्होने किस तरह का न्याय दिया, वे किस तरह की न्याय प्रणाली में विश्वास करते थे, इसका भी उन्होंने कुछ संकेत इसी अपने विदाई के भाषण में, यह किस्सा बता कर दिया,
In my judicial career I have followed the doctrine that a Judge's business is not to do justice but to administer law. ... [Let] the law prevail though justice may fall, is a good doctrine though it can be carried to the extreme as was done by a Maltese Judge. Malta is a small island with no room for more than one Judge. In the 18th Century there was a Judge Cambro who was in the habit of getting up early in the morning. One early morning when he was looking out from his window he saw a man being hotly chased by another. The victim was overtaken just under the window and stabbed with a knife. About that time a constable was to be seen in the distance and the assailant leaving the knife with the sheath in the wound ran away. Soon a baker came with his basket of bread and saw the victim lying dead. As he tried to remove the knife from the wound he saw a constable approaching from a distance. He got frightened and quickly stood up taking the blood stain sheath of the knife in his hand, put it into his basket and concealed himself beyond the entrance of a neighbouring house. All this was seen by Judge Cambo. The constable arrived there, found the victim dead and his body warm and still bleeding and informed that the murderer must be hiding somewhere in the neighbour hood. He made a search and promptly discovered the baker and interrogated him. Terror seized the baker and he lost his wits and gave incoherent and conflicting answers. His hands were stained with blood, the sheath in his basket fitted the knife that was found in the wound of the victim. He was found hiding himself near the scene of occurrence immediately after the murder. This circumstantial evidence was sufficient for conviction of anyone and in due course the baker was placed on trial before the Judge; there being no other Judge he had to try him. He found that the circumstantial evidence against the baker was so clinching that he could not but convict him. He brushed aside his personal knowledge that he was innocent and convicted him as required by the law and sentenced him to death. ... He [the Malta judge] had done justice according to law though he knew from personal knowledge that the baker was innocent. On similar evidence he would convict anyone and he had to convict the baker. I do not think my adoption of the doctrine would take me so far. I believe in the precept “do what you think right and do not worry about the consequences”.
इस किस्से की एक कड़ी और भी है जो कि न्यायमूर्ति देसाई ने अपने भाषण में न बता कर इसे दूसरी तरह से बतायी थी। मालटा के उस जज ने महारानी को एक पत्र लिखकर सही बात बतायी । इस पर महारानी ने उस baker की सज़ा माफ कर दी थी। न्यायमूर्ति देसाई उत्तर प्रदेश के नहीं थे पर उन्हें इलाहाबाद से इतना प्रेम हो गया कि वे कभी छोडकर नहीं गये और ९० वर्ष की उम्र में फरवरी १९९४ में उन्होंने अपनी अंतिम यात्रा गंगा जी के लिये की। एक माह के अन्दर उनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गयी। न्यायमूर्ति देसाई के बारे में न्यायमूर्ति रवी स्वरूप धवन ने भी लिखा है, जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं।
किरन देसाई
किरन देसाई प्रसिद्ध लेखिका अनीता देसाई की पुत्री हैं, खुद भी अंग्रेजी के उपन्यास लिखती हैं। उन्होने दो उपन्यास लिखे हैं: Hullabalaoo in the Guava Orchard और The inheritance of loss. इस उपन्यास पर उन्हें वर्षं २००६ का बुकर पुरस्कार दिया गया है। इस पुरस्कार को जीतने वाली वे दुनियां की सबसे कम उम्र की महिला हो गयी हैं। 
 The inheritance of loss साई नामक लडकी की कहानी है, जो १५ वर्ष की उम्र में अनाथ हो जाती है और अपने बाबा जज़ जेमू भाई पटेल के साथ रहने के लिये कलिम्पोंग में आती है। किरण देसाई की नानी जर्मन थीं और नाना बंगाली। उनके मौसी कलिम्पोंग में रहती हैं, उन्होने कुछ समय वहां भी बिताया है। इसमें एक कथानक साई का है जिसमें उसका, एक नवयूवक ज्ञान के साथ, कच्ची उम्र का प्रेम होता है। दूसरा कथानक जज के खानसामें का है जिसका लड़का अमेरिका में है और खानसामा यह सोचता है कि उसका लड़का वहां बहुत अच्छा कर रहा है पर वास्तव में उसका लड़का अमेरिका में अवैध तरीके से रहा है।  
किरन देसाई के पिता अश्विन हैं और उनके पिता थे - न्यायमूर्ति मुन्नीलाल चुन्नीलाल देसाई भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश इलाहाबाद उच्च न्यायालय, इलाहाबाद।
The inheritance of loss – पौत्री-लेखिका, बाबा जज़, और खानसामा - पौत्री का बाबा से मिलन।
यदि आप इस पुस्तक के कुछ अंश किरण देसाई की आवाज में सुनना चाहें जहाम वे अपने बाबा के बारे में  भी बात करती हैं तो आप यहां सुन सकते हैं। 

इस चिट्ठी में परिवार के सारे चित्र न्यायमूर्ति देसाई की पुत्री सुश्री लता के सौजन्य से हैं। पहले चित्र में न्यायमूर्ति देसाई अपने सारे परिवार के साथ - इसमें किरन नहीं हैं। वे उस समय पैदा नहीं हुई थीं। दूसरे चित्र में १३ साल की उम्र में किरन (बीच में), अपनी मां अनीता (बांये), और बड़ी बहन तानी (दायें) के साथ हैं।

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यह सेवा, न्यास द्वारा, हिन्दी देवनागरी (लिपि) को बढ़ावा देने के लिये शुरू की गयी है। मैं इसका सम्पादक हूं। आपके विचारों और सुझावों का स्वागत है। हम और भी बहुत कुछ करना चाहते हैं पर यह सब धीरे धीरे और इस पहले कदम की प्रतिक्रिया के बाद।