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Friday, November 16, 2012

सातवीं नामिर खान यादगार टेबल टेनिस प्रतियोगिता के परिणाम

 खुसरूबाग में, नामिर खान
सातवीं नामिर खान यादगार जिला टेबिल टेनिस प्रतियोगिता दिनांक १८.१०.२०१२ से २०.१०.२०१२ को सम्पन्न हुई। इसका विवरण निम्न है। 


Sunday, October 07, 2012

७वां नामिर खान यादगार इलाहाबाद जिला स्तरीय टेबल टेनिस प्रतियोगिता-२०१२


Namir - schooldays - Khusroobagh, Allahabad
वां नामिर खान यादगार
इलाहाबाद जिला स्तरीय टेबल टेनिस प्रतियोगिता-२०१२

Monday, August 22, 2011

६वीं नामिर खान यादगार टेबल टेनिस प्रतियोगिता-२०११

नामिर खान ११ जनवरी १९५५-१० जुलाई २००५
वीं नामिर खान यादगार
इलाहाबाद जिला स्तरीय टेबल टेनिस प्रतियोगिता-२०११

हमें आपको बताते हर्ष हो रहा है कि ६वीं नामिर खान यादगार इलाहाबाद जिला स्तरीय टेबल टेनिस प्रतियोगिता-२०११, २ से ४ सितंबर २०११ के बीच इलाहाबाद के म्यो हॉल कॉम्लेक्स में खेली जायगी। इसमें भाग लेने के लिये आपका स्वागत है। 

वृद्ध (पुराने नियमित रूप से न खेलने वाले) खिलाड़ियों की प्रतियोगिता, ३ सितंबर को ५:३० बजे शाम को खेली जायगी।

श्री दिनेश कुमार सिंह (भूतपूर्व कप्तान इलाहाबाद विश्वविदयालय टेबल टेनिस टीम) इसका उदघाटन २ सितंबर को, शाम ५:३० बजे करेंगे।

श्री एस के डे (भूतपूर्व कप्तान, उत्तर प्रदेश टेबल टेनिस टीम) पुरुस्कार वितरण करेंगे। फाईनल मैच एवं पुरुस्कार वितरण, ४ सितंबर २०११ (रविवार) को, शाम ५:३० बजे होगा।

प्रतियोगिता में भाग लेने के लिये श्री सत्यम सिंह से म्यो हॉल कॉम्लेक्स में सुबह या शाम या मोबाइल नम्बर मोबाइल नम्बर ९४५-४२०-३००७ पर सम्पर्क करें।

सारे मैच एवं उत्सव म्यो हॉल इलाहाबाद में आयोजित होंगे। इन सब में आपका स्वागत है।

 नीता सिंह
संयोजक कृष्णा वीरेन्द्र न्यास,
३७, ताशकन्त मार्ग इलाहाबाद २११००१

नोट: पांचवीं नामिर खान प्रतियोगिता के लिये यहां देखें।

प्रोफेसर नीलम सरन गौड़, अंग्रेजी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय 
वीं नामिर खान प्रतियोगिता का उदघाटन करती हुई

श्री अनीश धवन (भूतपूर्व उत्तर प्रदेश टेबल टेनिस विजेता) एवं उनकी श्रीमती
वीं नामिर खान प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरुस्कार देते हुऐ


VIth Namir Khan Memorial
Allahabad District Table Tennis Championship-2010

It gives us pleasure to invite you to participate in the VIth It gives us pleasure to invite you to participate in the VIth Namir Khan Memorial Table Tennis Championship scheduled to be held from 2nd to 4th September 2011 at the Mayo Hall Sports Complex. The Veterans' Event (for non-regular players) will be held on 3rd September at 5:30pm.

Sri DK Singh (former captain, Allahabd University Table Tennis team) has kindly consented to inaugurate the tournament on 2nd September 2011 at 5:30pm.

Shri SK Dey (former captain UP Table Tennis team) has kindly consented to be the Chief Guest for the finals and for giving the prizes. The finals will be played and the prize distribution will be held on 4th September, 2011 (Sunday) at 5:30pm.

All matches and functions will be held at Mayo Hall complex. All are welcome.

For entries please contact Shri Satyam Singh at Mayo Hall or mobile number 945-420-3007.


Dr Neeta Singh
Coordinator, Krishna Virendra Trust,
37, Tashkent Road Allahabad-211001
Note: See here for Vth Namir Khan Table Tennis championship. 

Sunday, April 20, 2008

अवर अर्थ - भू-प्रदूषण

अवर अर्थ (Our Earth) पर्यावरण से सम्बन्धित एक त्रैमासिक पत्रिका है। इसका वार्षिक मूल्य १५०/-रूपया व विद्यार्थी के लिए मात्र १००/-रूपया है। इसकी लाइफ मेम्बरशिप की राशि १५००/-रूपया है। इसे प्राप्त करने के लिये पत्र लिखें। पत्राचार का पता है,
सचिव, अवर अर्थ
एच० आई०जी० ७९ सेक्टर ई०
अलीगंज ,लखनऊ-२२६०२४ उ०प्र०
दूरभाष : (०५२२)-२३३१७४२, २३९४७५५
मोबाइल ९४१५०- १८१५५
टेलीफैक्स: ०५२२- २३३१७४२

इनका ई-मेल का पता यह है।

इन्हें अपनी पर्यावरण एवं कृषि प्रयोगशाला हेतु विषय विशेषज्ञों के सहयोग की आवश्यकता है। आप उनसे ऊपर लिखे पते पर समपर्क कर सकते हैं।

इस पत्रिका का हिन्दी भाग भी है जिसमे दिसम्बर २००७ के अंक में भू-प्रदूषण नामक एक लेख निकाला गया है। इसे श्री राघव शैलेन्द्र कुमार सिंह ने लिखा है। यह लेख इस पत्रिका के सौजन्य से है।

भू-प्रदूषण (Land Pollution)
भूमिका
भूमि शब्द के अन्तर्गत मृदा तथा स्थलाकृति का समावेश होता है। किन्तु वृहद दृष्टिकोण से देखा जाये तो इसमें किसी स्थान विशेष के समस्त भौतिक लक्षण सम्मिलित किये जा सकते है। पृथ्वी के धरातल का लगभग १/४ भाग भूमि है, पर वर्तमान में इसका लगभग आधा भाग ध्रुवी क्षेत्रों, मरूस्थलों तथा पर्वतों के रूप में होने से मनुष्य के आवास योग्य नहीं है। यद्यपि मानव ने भूमि की संरचना में परिवर्तन लाने की क्षमता प्राप्त कर ली है, परन्तु यह अभी छोटे पैमाने पर ही सम्भव है। सहारा तथा गोबी जैसे बड़े मरूस्थलों तथा उत्तरी अफ्रीका जैसे सूखे भू-खण्ड़ो को आवास योग्य या उपजाऊ भूमि में रूपान्तरित करना अभी भी मनुष्य के सामर्थ्य के परे की बात है।

इस प्रकार वर्तमान पृथ्वी का केवल २८० लाख वर्ग मील क्षेत्र ही आवास तथा खेती योग्य भूमि है। एक अनुमान के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के भरण-पोषण के लिए २१/२ एकड़ भूमि से उत्पादित उत्पादों की आवश्यक्ता होती है। मानव की तीव्र गति से बढ़ती ह़ई जनसंख्या तथा प्रति व्यक्ति द्वारा उपभोग में लायी जाने वाली भौतिक सामग्री की आवश्यक्ता में बढ़ोत्तरी को देखते हुए यह उपलब्ध भूमि अल्प नहीं तो बहुत अधिक भी नहीं कहीं जा सकती है।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि पृथ्वी पर योग्य भूमि सीमित है। अत: इसके प्रति हमारा व्यवहार समझदारी पूर्ण होना चाहिए। यद्यपि भूमि को पहले से ही बहुत महत्व दिया जाता रहा है तथापि पृथ्वी की अन्य परिघटनाओं की तुलना में भूमि के बारे में हमारा ज्ञान अल्प ही है। मनुष्य ने इसे हमेशा अजीवित सम्पत्ति माना है। मनुष्य ने हमेशा इस तथ्य की उपेक्षा की है कि पृथ्वी एक जीवित इकाई है तथा इसके प्राकृतिक साधनों की क्षमता सीमित है।

भू-प्रदूषण के स्रोत (Sources of Land Pollution)
भू- प्रदूषण की समस्या यथार्थ में ठोस अपशिष्ट के निक्षेपण (disposal) की समस्या का ही दूसरा नाम है। पर बृहद दृष्टिकोण से इसके अन्तर्गत मृदाक्षरण, मृदा का विभिन्न स्त्रोतों से रासायनिक प्रदूषण ,भू-उत्खनन इत्यदि समस्त मानवकृत तथा प्राकृतिक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप भूमि के आधारभूत गुणों में होने वाले परिवर्तनों का समावेश किया जाता है।

इस प्रकार भू- प्रदूषण के निम्न मुख्य स्रोत हो सकते है:
  1. घरेलू अपशिष्ट (Domestic wastes)- घरेलू अपशिष्ट के अन्तर्गत मुख्यत: सूखा कचरा तथा रसोई का गीला जूठन सम्मिलित होतें है। सूखे कचरे मेंं झाड़न-बुहारन के फलस्वरूप एकत्रित धूल, रददी कागज, गत्ता, लकड़ी पत्तियाँ, काँच या चीनी मिटटी के टूटे बर्तन , शीशियाँ ,टीन के डिब्बें ,चूल्हें की राख, कपड़ों के टुकडें इत्यदि होते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ बड़ी वस्तुयें भी इसमे शमिल की जा सकती है। जैसे टूटे फर्नीचर ,बिगड़े हुए उपकरण मोटर गाड़ियों के निरर्थक अवयव, टायर इत्यदि । रसोईघर से निकले पदार्थो से सब्जियों , दालें फलों के छिलके, सड़े-गले फल, सब्जियों के डंठल, फलों की गुठलियों, चाय की पत्तियाँ अंडों के छिलके तथा खाने के उपरान्त बची जूठन सम्मिलित होते है। घरेलू अपशिष्ट की प्रति व्यक्ति मात्रा आर्थिक स्थिति तथा सामाजिक विकास पर निर्भर करती है। अत: भिन्न- भिन्न देशों मे इसका औसत भिन्न- भिन्न होता है। उदाहरणार्थ , अमेरिका में घरेलू अपशिष्ट का औसत ५० किलोग्राम/ व्यक्ति/ दिन है। हमारें देश में शहरी आबादी (लगभग २० करोड़ ) द्वारा उत्पन्न ठोस अपशिष्ट की मात्रा ५ करोड़ टन प्रतिवर्ष आँकी गयी है। इस हिसाब से पूरे देश में बहुत बड़ी मात्रा में ठोस अपशिष्ट उत्पन्न होता होगा क्योंकि देश की गुल जनसंख्या शहरी आबादी का लगभग पाँच गुना है।
  2. नगर पालिका अपशिष्ट (Municipal Wastes): नगरपालिका अपशिष्ठ के अन्तर्गत घरों से निकाला कूडा-कर्कट तथा मानव मल (Human excreta), बाजार विशेष कर सब्जी मार्केट मे यत्र-तत्र फेंके गये फलों और सब्जियों का कचरा ,विभिन्न औद्योगिक संस्थाओं का कूड़ा, बाग- बगीचों का वानस्पतिक कचरा, पशु शालाओं का चारा मिश्रित गोबर,लीद सड़कों नालियों व गटरों से निकाला कचरा तथा कीचड़, वधशालाओं, खटिक की दुकानों (Butcher's shop),मछली बाजार, कुक्कुट पालन केन्द्रों तथा चर्म शोधन संस्थानों इत्यदि सभी प्रकार के अपशिष्ट का समावेश किया जा सकता है।
  3. औद्योगिक अपशिष्ट -अत्याधिक औद्योगीकृत देशों में घरेल तथा नगरपालिका व्यर्थ कुल ठोस अपशिष्ट का अंश भर होते है। वहाँ के मुख्य अपशिष्ट तो औद्योगिक व्यर्थ ही होते है। इन अपशिष्ट में कुछ थोड़े - बहुत जैव अपघटनशील, कुछ ज्वलनशील, विषैले, कुछ दुर्गन्धयुक्त तथ कुछ अक्रियाशील होतें है, परंतु सभी स्थान घेरते हैं अधिकांशत: किसी न किसी रूप में भू-प्रदूषण का कारण बनते है। औद्योगिक अपशिष्ट के निक्षेपण की समस्या आर्थिक सीमाओं के कारण और भी जटिल हो जाती है। उद्योग प्रबंधकों के दृष्टिकोण में औद्योगिक अपशिष्ट को बिना समुचित उपचार के उपलब्ध भूमि पर यूँ ही फेंक देना या गडढे खोद कर विमज्जित कर देना कम खर्चीला तथा अधिक सुविधाजनक होता है। यही कारण है कि औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास उपलब्ध भूमि पर जगह-जगह अपशिष्टों का ढेर बढ़ता जाता है।
  4. कृषि अपशिष्ट (Agricultural Wastes)- खेतों में फसलों की कटाई के बाद बचे पत्ते, डंठल, घास-फूस,बीज इत्यदि मुख्य कृषि व्यर्थ के जा सकते है। साधारणत: इनसे कोई गंभीर प्रदूषण नहीं होता क्योंकि पौधों के ये अवशेष मिटटी मे मिलकर जैविक क्रियाओं द्वारा स्वत: ही अपघटित हो जाते है। समस्या तो तब उत्पन्न होती है जब खेतों पर इनका अनावश्यक ढेर लगा दिया जाता है । वर्षा के जल से यह कार्बनिक मलवा सड़ने लगता है तथा प्रदूषण का कारण बनता है। खेतों में प्रयोग में लायी जाने वाली खादों , कीटनाशियों तथा पेस्टनाशियों से भी भू-प्रदूषण होता है।
  5. रासायनिक अपशिष्ट (Chemical Wastes)- उद्योगों द्वारा भूमि पर यूँ ही फेंक दिये गये व्यर्थों में अनेक प्रकार के रासायनिक पदार्थ होते हैं जो भू-प्रदूषण करते है। कभी-कभी दुर्घटनावश या अनभिज्ञनतावश कई रासायनिक पदार्थ मृदा मं जा मिलते है। ये प्रदूषक तत्व घरेलू नालियों के जल , वाहित जल या भूमिगत जल में जा मिलते है। इस जल से खेतों या सब्जियों के बगीचों की सिंचाई किये जाने के कारण फल , सब्जियों, विभिन्न प्रकार के अन्न तथा दालें मनुष्य को अनेक प्रकार से हानि पहुँचाते है।
खनिज पदार्थों के अपक्षरण, अकार्बनिक पदार्थों के सड़ने एवं निम्नीकरण के फलस्वरूप मृदा में अनेक घुलनशील कार्बनिक तथा अकार्बिनक रासायनिक पदार्थ प्राकृतिक रूप से विद्यमान रहते है। इनमें से अधिकांश सूक्ष्म जैविक क्रिया के द्वारा अकार्बिनक आक्साइडस में आक्सीकृत हो जाते हैं। पर कुछ कार्बिनक यौगिक आक्सीजन रहित भूमिगत जल में मिल जाने के कारण पूर्णरूप से आक्सीजन नहीं हो पाते हैं तथा जन प्रदूषण का कारण बनतें है।

फसलों की पैदावर बढ़ाने के लिए खेतों मे तरह -तरह की खादें डाली जाती है। ये खादें विभिन्न रासायनिक पदार्थो की बनी होती है। इसके अशुद्व मदार्थ मृदा को संदूषित करतें है। इसके अतिरिक्त औद्योगिक अपशिष्ट एवं संश्लिष्ट कार्बनिक रसायनों द्वारा प्रदूषित जल का खेतों औश्र बगीचों में सिंचाई हेतु प्रयोग भी मृदा के रासायनिक प्रदूषण का कारण बनता है।

इसके अलावा, मृदाक्षरण से भी भूमि की प्राकृतिक संरचना परिवर्तित होती है तथा उपयोगीं भूमि नष्ट होती है, अत: इनका समावेश भू-प्रदूषण के अन्तर्गत किया जा सकती है। गुरूत्व , वायु जल इत्यदि के समन्वित बल के प्रभाव के फलस्वरूप भूमि के कटाव की प्रक्रिया मृदा -क्षरण कहलाती है। दूसरे शब्दों में मृदा -अपरदन एक ऎसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा मृदा कण बाहरी कारकों (हवा या बहते जल) के प्रभाव से एक स्थान से दूसरे स्थान को स्थानान्तरित हो जातें है। इस प्रकार भूमि का ऊपरी ऊपजाऊ भाग अनायास ही नष्ट हो जाता है।

मृदा क्षरण प्रकृति में चलने वाली एक अत्यन्त धीमी प्रक्रिया है, परन्तु इसके परिणाम अत्याधिक दूरगांमी तथा व्यापक होते है। मरूस्थल, कृषि अयोग्य बड़े -बड़े भूखण्ड, वनस्पतिरहित पहाड़ी क्षेत्र मृदा क्षरण के ही परिणाम है। प्राकृतिक रूप से होने वाले भूक्षरण की गति को बढ़ाने में मानव का अवैज्ञानिक रूप से बड़ा हाथ रहता है। अत्याधिक कृषिकरण, वनों के विनाश , पशुओं , द्वारा अत्याधिक चारण से भी भूक्षरण बढ़ता है। इन सभी कारणों से उत्पादनशीलता कम होती है तथा वनस्पति आवरण कम होता जाता है। पौधों की कमी के फलस्वरूप भूमि में मृदा को बाँध कर रखने वाले जड़ तंत्रों की अनुपस्थिति से मृदा क्षरण अधिक होता है।

भू-प्रदूषण के दूष्प्रभाव (Harmful Effects of Land Pollution)
भू-प्रदूषण से होने वाले अनेकानेक दुष्प्रभाव स्पष्ट देखे जा सकते है। इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं-
  1. कूड़े -करकट से जहाँ एक ओर गंदगी तथा दुर्गन्ध फैलती है, वहीं दूसरी ओर मच्छर, मक्खी, कीड़े -मकोड़े तथा चूहों का उत्पात भी बढ़ता है। यही नहीं, गंदगी में विभिन्न प्रकार की बीमारियों के कीटाणु भी तेजी से पनपते है। पेचिश, प्रवाहिका, आंत्रशोध, हैजा, मोतीझरा, आँखों के रोग विशेषकर नेत्र श्लेषमा शोध (Conjunctivitis) एवं तपेदिक रोगों के कीटाणुओं के प्रसार को गंदगी से बढ़ावा मिलता है।
  2. मानव मल का नि कासन तथा निक्षेपण यदि समुचित ढंग से न हो तो इससे जन स्वास्थ्य के लिए गंभीर संकट पैदा हो जाता है। मानव मल से जहाँ एक ओर वातावरण दूषित होता है, वहीं दूसरी ओर अनेक प्रकार के रोगों का प्रसार भी होता है। टाइफायड, पैराटाइफायड, आंत्रशोध, पेचिश , हैजा, संक्रामण यकृत शोध, पोलियो इत्यदि बीमारियाँ अपर्याप्त मल व्यवस्था के फलस्वरूप फैलती है।
  3. घरों से निकलने वाले व्यर्थ जल की समुचित व्यवस्था न होने पर यह जल घरों के बाहर सड़कों तथा गलियों में यों ही बहा दिया जाता है। इससे कीचड़ तथा दलदल बन जाते है जिनमें मक्खी, मच्छर व अन्य कीड़े-मकोड़े पनपते है।
  4. आजकल कहीं-कहीं खेती में मल -जल द्वारा सिंचाई की जाती है। पर मल-जल के लगातार प्रयोग से मृदा के छिद्रो की संख्या लगातार घटती चली जाती है। एक अवस्था ऎसी आती है जब मल-जल के ठोस कणों के जम जाने के कारण मृदा पूर्णरूपेन (clog) हो जाती है। इस अवस्था तक पहुंचने के बाद वायु मृदा के छिद्रों से परिसंचरित नहीं हो पाती है। मृदा में उपस्थि सूक्ष्म जीवों की वायुश्रवसन क्रियायें जारी नही रह पाती है। इस अवस्था में भूमि की प्राकृतिक मल-जल उपचार क्षमता पूर्णत: नष्ट हो जाती है।
  5. विभिन्न प्रकार के अपशिष्ट के निक्षेपण में विभिन्न सफाई व्यवस्थाओं के रख-रखाव पर बहुत खर्च आता है। इसके अतिरिक्त निकास नालों के अवरूद्व होने या सफाई कर्मचारियों द्वारा हड़ताल किये जाने पर स्थिति बहुत गंभीर हो जाती है।
  6. बहुधा ठोस अपशिष्ट को निक्षेपण हेतु भूमि में निमज्जित कर दिया जाता है। इससे एक तो अनवीनकरणी (non-renewal) धातुओं विशेष कर ताँब, जिंक , लेड इत्यदि की प्रभावकारी हानि होती है तथा दूसरे विजातीय तत्वों के समावेश से मृदा की प्रकृति में परिर्वतन आता है।
भू-प्रदूषण नियंत्रण के उपाय:
  1. अपशिष्ट पदार्थो का समुचित निक्षेपण किया जाना चाहिए। विभिन्न अपशिष्टों का निक्षेपण अनेक विधियों के समन्वय द्वारा सन्तोषप्रद ढंग से किया जा सकता है।
  2. नागरिकों को चाहिए कि वे अपने घरों का कूड़ा-कचरा सड़क पर न फेंक कर इस हेतु स्थापित कचरा पात्रों में ही फेंके। गाँवों में जहाँ नगरपालिका सेवायें उपलब्ध नहीं हैं, कूड़े -कचरे का निस्तारण खाद के गडढों में करना उचित होगा।
  3. नगरपालिका तथा नगर निगम इत्यदि संस्थानों के अधिकारियों को चाहिए कि वे अपशिष्ट निक्षेपण को समुचित प्राथमिकता दें। कूड़े-करकट के संग्रहण (Collection), निष्कासन (removal), तथा निस्तारण (disposal) का प्रबन्ध चुस्त होना चाहिए।
  4. नगरपालिका को चाहिए कि वह नगर अथवा शहर के कुछ संस्थाओं को कम्पोस्टिंग हेतु जगह-जगह संयंत्र लगाने पर प्रोत्साहित करे। अस्वच्छ शौचालयों को सम्प्रवाही (flush type) स्वच्छ शौचालयों द्वारा विस्थापित किया जाना चाहिए। इससे जहाँ मानव द्वारा मलवाहन किये जाने की सामाजिक व्यवस्था को निराकरण होगा, वहीं दूसरी ओर स्वच्छता भी बनी रहती है।
  5. औद्योगिक संस्थानों को अपने अपशिष्ट पदार्थो को बिना पर्याप्त उपचार के विसर्जित करने से रोका जाना चाहिए तथा उनके द्वारा अपशिष्ट पदार्थो के निक्षेपण की समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए।
  6. कृषि कार्यो में ऎसे आदर्श रसायनों का प्रयोग किया जाना चाहिए जिनका मृदा में जैविक विघटन सुगमतापूर्वक हो सके। स्थायी प्रवृत्ति के कार्बनिक रसायनों विशेष कर डी.डी.टी. , लिण्डेन, ऎल्ड्रिन तथा डील्ड्रिन इत्यदि के प्रयोग पर पाबन्दी लगा देनी चाहिए अथवा इसका प्रयोग बहुत कम किया जाना चाहिए।
  7. मृदा क्षरण तथा भू-उत्खनन से होने वाले मृदा हास को कम करने के उपायों को अमल में लाया जाना चाहिए।
  8. नागरिकों में सफाई के प्रति जागरूकता जगा कर शहरों में यत्र-तत्र बढ़ रहे कचरे के ढेरों की समस्या से निपटा जा सकता है।
  9. मनुष्यों को ठोस अपशिष्ट के फलस्वरूप बढ़ते भू-प्रदूषण की समस्या को सुलझाना होगा अन्यथा इसके परिणाम बड़े गंभीर होंगें । हमें आज स्वयं से ही यह प्रश्न पूछना होगा कि विभिन्न प्रकार के उपादानों को जिनको कि हम आज के इस अति भौतिक युग में प्रयोग कर रहे हैं, क्या उनका उत्पादन करना आवश्यक भी है?

Friday, February 01, 2008

बधाई और पुरुस्कार

पिछले साल तरकश के द्वारा, उदयिमान २००६ के हिन्दी चिट्ठाकारों का चुनाव करवाया गया था। इस साल पुनः तरकश के द्वारा सर्वश्रेठ महिला एवं पुरुष चिट्ठाकार २००७ का चुनाव करवाया गया। इसके सफल आयोजन पर तरकश टीम को बधाई।

इस चुनाव में, सर्वश्रेष्ट महिला चिट्ठाकार के लिये सुश्री रंजना भाटिया एवं सर्वश्रेष्ट पुरुष चिट्ठाकार के लिये श्री मोहिंदर कुमार का चुनाव हुआ है। आप दोनो को हमारे न्यास की तरफ से को बधाईयां।


हमारे न्यास ने सर्वश्रेष्ट महिला चिट्ठाकार को ५०० रुपये की हिन्दी पुस्तकें, पूर्वी बजाज की स्मृति में, भेंट करने का पुरुस्कार देने का वायदा किया था। न्यास की तरफ से सुश्री रंजना भाटिया को उनकी मन पसन्द निम्न चार पुस्तकें भेजी जा रही हैं:
  • गुनाहों का देवता; लेखक, धर्नवीर भारती;
  • मुझे चांद चाहिये; लेखक, सुरेन्द्र वर्मा;
  • खोया हुआ था कुछ; लेखक, निदा फाज़ली;
  • गज़ले, नज़्में, शेर और जीवनी; लेखक, बशीर बद्र।
रंजना जी को यह पुस्तकें, सप्ताह भर के अन्दर मिल जानी चाहिये।

पिछले साल हमने, श्री समीर लाल जी को, सवर्ण कलम से नवाज़े जाने पर हिन्दी की तीन पुस्तकें - आवारा मसीहा, अर्धनारीश्वर, और प्रथम प्रतिश्रुति - टोरंटो भेजी थीं।

हम चाहेंगे कि जिन पुस्तकों को हम रंजना जी के पास भेज रहें हैं वे, उन पुस्तकों को पढ़ कर, हम सब के लिये समीक्षा भी करें।

Sunday, September 09, 2007

सुभद्रा - जबलपुर आगमन, मुश्कलें, और रचनायें: मिला तेज से तेज

(सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी, इनकी पुत्री, सुधा चौहान ने 'मिला तेज से तेज' नामक पुस्तक में लिखी है। हम इसी पुस्तक के कुछ अंश, हंस प्रकाशन के सौजन्य से प्रकाशित कर रहें हैं। इस चिट्ठी में उनके जबलपुर जाने का करण, वा इनके लिखे गयी रचनाओं के बारे में है। सुभद्रा कुमारी चौहान की सारी रचनायें 'सुभद्रा समग्र' में हैं।

इन दोनो पुस्तकों को हंस प्रकाशन १८, न्याय मार्ग, इलाहाबाद दूरभाष २४२३०४ ने प्रकाशित किया है। 'मिला तेज से तेज' पुस्तक के पेपरबैक प्रकाशन का मूल्य ८० रूपये और हार्ड कवर का मूल्य १६० रूपये है। 'सुभद्रा समग्र' पुस्तक के हार्ड कवर का मूल्य ३५० रुपये है। इन दोनो पुस्तकों को आप हंस प्रकाशन से पोस्ट के द्वारा मंगवा सकते हैं।)


माखनलाल चतुर्वेदी ने जबलपुर से 'कर्मवीर' का प्रकाशन आरम्भ कर दिया। लक्ष्मण सिंह को पत्रकारिता एक ऎसा माध्यम लगा जिसके द्वारा देश-सेवा और जीविकोपार्जन दोनों का साथ-साथ निर्वाह हो सकता था। अबकी बार पति-पत्नी दोनों जबलपुर आये। पत्नी शायद सास के अनुशासन में रहकर मात्र सुघर गृहिणी बनकर सन्तुष्ट नहीं थी। उसके भीतर जो तेज था, काम करने का जो उत्साह था, कुछ नया कर जाने की जो लगन थी, उसके लिए घर की चहारदीवारी की सीमा बहुत छोटी थी। यों भी यह एक स्वाभाविक बात थी कि पति-पत्नी दोनों साथ रहना चाहते हों। जबलपुर से 'कर्मवीर' के प्रकाशन द्वारा उन दोनों को यह मनचाही राह मिल गयी। माखनलाला जी 'कर्मवीर' के प्रधान सम्पादक थे और लक्ष्मण सिंह, साहित्य-सम्पादक। माखनलाल जी कांग्रेस के नेता थे, उसके काम से उन्हें अक्सर बाहर रहना पड़ता था। ऎसी दशा में 'कर्मवीर' के सम्पादन का अधिकांश भार लक्ष्मण सिंह को ही उठाना पड़ता था।
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तभी सन् २८-२९ में इलाहाबाद के एक युवक प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त' के पत्र सुभद्रा के पास आने लगे। कालान्तर में उन्हीं की इच्छा और प्रयत्नों से सुभद्रा की कविताओं का पहला संग्रह 'मुकुल' के नाम से निकला।
...

'मुकुल' प्रकाशित हुआ और हिन्दी-संसार ने दिल खोलकर उसका स्वागत किया। उसी वर्ष हिनदी साहित्य सम्मेलन ने लेखिकाओं के लिए सेकसरिया पुरस्कार की घोषणा की थी। पांच सौ रूपयों का यह पुरस्कार सबसे पहले 'मुकुल' को मिला। अपने गाढ़े दिनों में सुभद्रा को 'मुकुल' से एकमात्र यही पांच सौ रूपये की राशि प्राप्त हुयी जो उनके बहुत काम आयी। उसके बाद 'मुकुल' के कई संस्करण छपे, एकाधिक स्थानों पर वह पाठ्यपुस्तक के रूप में स्वीकृत हुआ, पर सुभद्रा को उससे कोई अर्थ प्राप्ति नहीं हुयी।
...

इस बीच बिखरे मोती छप गया था और उस पर पुरस्कार भी मिल चुका था। एक दिन काका ने मां से कहा कि 'लाओ भाई, मैं भी तो पढ़ूं, कैसी हैं तुम्हारी कहानियां।' बाद में मां सदा हंसकर इस बात को बताती थीं, पर अपने साहित्य- रसिक पति से ही सबसे अन्त में प्रशंसा पाने का क्षोभ उनके मन में कहीं न कहीं रहा ही होगा।

मां की अधिकांश कहानियों का उत्स किसी न किसी सत्य घटना के भीतर होता था, लेकिन उसमें कल्पना का ताना-बाना उसे कुछ का कुछ बना देता था।

उनकी एक कहानी है, 'चढ़ा दिमाग'; उसमें सम्पादक जी लेखिका और लेखिका एक अन्य व्यक्ति को लिखे गये पत्रों के लिफाफे भूल से बदल देते हैं और लेखिका को सम्पादक जी का वह पत्र मिल जाता है, जो उन्होंने उस अन्य व्यक्ति को लेखिका की शिकायत करते हुए लिखा है कि वह न तो पत्रों का जवाब भेजती है और न कोई कहानी ही भेज रही है, उसके मूल में भी एक सत्य घटना है। श्री इलाचन्द्र जोशी जब 'विश्वमित्र' के सम्पादक थे तो उन्होंने मां को लिखा गया पत्र नर्मदाप्रसाद खरे को भेज दिया था और गलत लिफाफे में रखे जाने के कारण खरे जी को लिखा गया पत्र मां के पास आ गया था। उस कहानी में वर्णित कुर्की की घटना भी उनके अपने अनुभव की ही है।

इसी प्रकार 'एकादशी' में जिस ब्राम्हण बाल-विधवा का वर्णन है, वह भी सत्य घटना पर आधारित है और उस कहानी का डाक्टर सम्भवत: डाक्टर जार्ज डिसिलवा थे, जो एक अच्छे डाक्टर होने के साथ-साथ जबलपुर के एक बड़े ही नि:स्पृह और निडर कांग्रेस कार्यकर्ता थे, जिन्हें अपने उन्हीं गुणों के कारण कांग्रेस की नेताशाही में कभी कोई स्थान नहीं मिला।

मां की अधिकांश कहानियों में परिवार के कठोर अनुशासन में जकड़ी हुयी परवश नारी की पीड़ा या समाज से टक्कर लेने के लिए उद्यत विद्रोहिणी नारी के विवश क्रोध का स्वर ही प्रमुख है। उनकी कहानी की नायिका अपने व्यक्तित्व के सम्मान के लिए समाज को चुनौती दे सकती है, पुरूषों से बराबरी की मित्रता का सम्बन्ध बना सकती है। लेकिन उनकहानियों की विद्रोहिणी नारी बहुत सी कहानियों में अपने प्रति किये गये अन्यायों से हारकर, टूटकर या तो पागल हो जाती है या आत्महत्या कर लेने को विवश हो जाती है।

एक कहानी 'मंझली रानी' इस प्रकार शुरू होती है----

'वे मेरे कौन थे ? मैं क्या बताऊं ! वैसे देखा जाय तो वे मेरे कोई भी न होते थे। होते भी कैसे। मैं ब्राम्हण, वे क्षत्री; मैं स्त्री, वे पुरूष फिर न तो रिश्तेदार हो सकते थे और न मित्र। आह, यह क्या कह डाला मैंने! मित्र ? भला किसी स्त्री का कोई पुरूष भी मित्र हो सकता है और यदि हो भी तो समाज इसे बर्दाश्त करेगा ?... यदि कोई स्त्री किसी पुरूष से किसी प्रकार का व्यवहार रखती है, प्रेम से बातचीत करती है, तो वह स्त्री भ्रष्टा है, चरित्र-हीना है।'
...

एक दीवाली की बात है, काका शहर से बाहर गये हुए थे और ऎन दीवाली के रोज माँ को सहसा ध्यान
आया कि बच्चों के लिए खिलौने, मिठाई, पटाखे मँगाने को उनके पास रूपये नहीं हैं। अब क्या हो ? तो उन्होंने बच्चों के लिए जो कविताएँ लिखी थीं, उनकी कापी उठायी और बच्चों को साथ लेकर वे स्कूली किताबों के एक प्रकाशक के घर पहुँचीं कि उसे कविता-पुस्तक देकर उससे कुछ रूपये ले लें। उन्हें पूरा विश्वास था कि रूपये मिल जायेंगे तो वहीं से बाजार जाकर दीवाली का सब सामान खरीद लिया जायगा। यही सोचकर उन्होंने बच्चों को भी साथ ले लिया। लेकिन माँ दुनियादारी से अनभिज्ञ हों तो हों , प्रकाशक तो अनभिज्ञ नहीं था। दीवाली के दिन कौन लक्ष्मी को अपने घर से जाने देता है। अत: प्रकाशक ने उस दिन रूपया देने से बिल्कुल इनकार कर दिया। इस आने जाने में जो दो- चार रूपये हाथ में थे वे भी ताँगे वाले को भेट हो गये । और माँ अपने बच्चों को लेकर निराश घर लौट आयीं । शाम को पाठक जी आये तो उन्हें मालूम हुआ कि बच्चों के लिए मिठाई, पटाखे आदि कुछ भी नहीं आये । वे उल्टे पाँव लौटे और घण्टे-दो-घण्टे बाद सब चीजें लेकर आ गये। बच्चे निराश होकर शाम से ही बिस्तरों पर दुबक गये थे। लेकिन फिर पटाखों के शोर-गुल में उन लोगों की निराशा आनन-फानन उड़ गयी और खूब धमाचौकड़ी मची।
...

माँ और काका की अनुपस्थिति में इसी तरह लस्टम-पस्टम उनकी गिरस्ती की गाड़ी चलती रही। माँ अपनी किताब बेचकर जो कुछ मुझे दे गयी थीं और भी जो कुछ घर में मिला, उसका अधिकांश खेती में ही लग गया। एक दिन ऎसी स्थिति आयी कि घर कमा एक-एक पैसा चुक गया था। तब तक सरकारी भत्ता मिलना शुरू नहीं हुआ था। तब मेरी उम्र ऎसी नहीं थी कि मैं बहुत चिन्ता करती, फिर भी इस चिन्ता से कि कल यदि एक पैसे का भी खर्च सामने आ जाय तो मैं क्या करूंगी , मुझे रात को नींद नहीं आयी। माँ स्वयं इतनी ज्यादा खरीददारी करती थीं कि उनके घर में कभी किसी और को पैसा खर्च करने का मौका नहीं मिलता था । इसलिए खरीदारी करना या पैसा खर्च करना मुझे आता भी नहीं था । अपनी माँ कली यह फिजूलखर्ची की आदत इस समय हम बहन भाइयों के बहुत काम आयी। एक तो हमें पैसा खरचने की आदत नहीं पड़ी ,दूसरे अपनी माँ की अतिरिक्त खरीदारी के कारण हमारे पास इतने कपड़े थे कि साल भर तक तो एक भी कपड़ा बनवाने की जरूरत नहीं थी। यों भी घर में रोज की जरूरतों की सभी चीजें थीं। फिर भी साग-सब्जी खरीदने को, बिजली का बिल चुकाने को, महराजिन और महरी की तन्ख्वाह देने को और इसी तरह के दूसरे छोटे - मोटे कामों के लिए रूपयों की जरूरत पड़ती ही है। बहुत रात तक उधेड़-बुन करते-करते कभी मेरी आंख लग गयी। सबेरे भाइयों को स्कूल भेजने और खुद अपनी तैयारी करने की व्यस्तता में मैं रात की चिन्ता की बात भूल चुकी थी। दोपीर को पोस्टमैन चालीस रूपये का एक मनीआर्डर लेकर आया। बी.बी.सी. से मां की कविताएं फौज के लिए प्रसारित की गयी थीं, उसी का यह रूपया था। किसे यह कल्पना हो सकती थी कि अंग्रेज सरकार जिस कवि के मुक्त रहने में अपने अस्तित्व के लिए खतरा देखती है, उसी की कविता वह अपने सिपाहियों के लिए प्रसारित करेंगे ! जो हो, मुझको इस समय वह रूपया ऎसा ही लगा, जैसे भगवान् ने मेरी पुकार सुनकर भेजा हो।


मिला तेज से तेज
सुभद्रा कुमारी चौहान -बचपन, विवाह।। सुभद्रा - जबलपुर आगमन, मुश्कलें, और रचनायें।।

Tuesday, August 28, 2007

फिराक के जन्मदिन पर उनकी चार गज़लें

फिराक का जन्म २८ अगस्त १९१३ को हुआ था। उनके जन्मदिन पर उनकी चार गज़लें इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पत्रिका 'बरगद' के सौजन्य से। यह इसके वर्ष १ अंक ४ से ली गयी हैं। आप इस पत्रिका के वार्षिक सदस्य बन सकते हैं। वार्षिक सदस्यता ग्रहण करने के लिये, छात्र-छात्रायें ५० रूपये (पच्चीस रूपये डाक खर्च अतिरिक्त) अन्य १०० रूपये (पचास रूपये डाक खर्च अतिरिक्त) बरगद के नाम ड्राफ्ट द्वारा भेजें। इसमें छपने के लिये रचनायें, सूचनायें व छाया चित्र भी आमंत्रित हैं। पता-
सेन्टर आफ फोटोजर्नलिज्म एण्ड विजुअल कम्युनिकेशन , डेलीगेसी परिसर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद-२११००२ e-mail: bargad@rediffmail.com


आंखों में जो बात हो गई है
एक शरहे हयात हो गई है
जब दिल की वकात हो गई है
हर चीज की रात हो गई है
गम से छूट कर यह गम है मुझ को
क्यों गम से नजात हो गई है
जिस शय पर नजर पड़ी तेरी
तस्वीरे-हयात हो गई है
मुद्दत से खबर न मिली दिल की
शायद कोई बात हो गई है
इस दौरे में जिन्दगी बशर की
बीमार की रात हो गई है
कया जानिये मौत पहले क्या थी
अब मेरी हयात हो गई है
एक एक सिकत 'फिराक' उस की
देखा है तो जात हो गई है


बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ए जिन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं
जिसे कहते है दुनिया कामियाबी वाये नादानी
उसे किन कीमतों पर कामियाब इन्सान लेते हैं
तबियत अपनी घबराती है, जब सुनसान रातों में
हम ऎसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं
खुद अपना फैसला भी इश्क में काफी नहीं होता
इसे भी कैसे कर गुजरें जो दिल में ठान लेते हैं
हम आहंगी में भी इक चाश्नीहै इखतेलाकों की
मेंरी बातें बउनवाने - दिगर वह मान लेते हैं
फिराक अकसर बदल कर भेस मिलता है कोई काफिर
कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं



किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
यह हुस्नों-इश्क तो घोल है सब मगर फिर भी
हजार बार जमाना इधर से गुजरा है
नई सी हैं कुछ तेरी रहगुजर फिर भी
शबे - फिराक से आगे है आज मेरी नजर
कि कट ही जायेगी यह शाम बेसहर फिर भी
अगर वे बेखुदी-ए-इश्क को जमाना हुआ
फिराक करती रही काम वह नजर फिर भी


एक शबे-गम वह भी थी जिसमें जी भर आये तो अश्क बहायें
एक शबे-गम यह भी है जिसमें ए दिल रो-रोकर सो जायें
अलग-अलग बहती रहती है हर इंसां की जीवन धारा
देख मिलें कब आज के बिछड़े ले लूं , बढ़ के तेरी बलायें
सुनते हैं कुछ रो लेने से जी हलका जो जाता है
शायद थोड़ी बरस कर छंट जायें कुछ गम की घटायें
सबको अपने अपने दुख हैं सबको अपनी अपनी पड़ी है
ए दिले गमगीं तेरी कहानी कौन सुनेगा किसको सुनायें
बातें उसकी याद आती हैं लेकिन हम पर यह नहीं खुलता
किन बातों पर अश्क बहायें, किन बातों से जी बहलायें
रात चली है जोगन बन कर बाल संवारे लट छटकाये
छुपे 'फिराक' गगन पर तारे, दीप बुझे हम भी सो जायें

Tuesday, August 14, 2007

बरगद, इलाहाबाद और नामवर सिंह

(कुछ साल पहले, इलाहाबाद पुरातन छात्र संघ एक पत्रिका 'Under the banyan tree' नाम से निकालता था। यह कुछ समय से नहीं निकल रही है। इसके कुछ लेख प्रो. हरीश्चन्द्र (१९२३-८३) और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को दाखिला कैसे मिला हमने प्रकाशित किये हैं। पिछले साल से इलाहाबाद विश्वविद्यालय 'बरगद' के नाम से पत्रिका निकाल रहा है जिसमें इलाहाबद विश्वविद्यालय और इलाहाबाद के बारे में सूचना रहती है। इसमें छपने के लिये रचनायें, सूचनायें व छाया चित्र आमंत्रित हैं। इसके वार्षिक सदस्य बनें 'बरगद' की वार्षिक सदस्यता ग्रहण करने के लिये छात्र-छात्रायें ५० रूपये (पच्चीस रूपये डाक खर्च अतिरिक्त) अन्य १००रूपये (पचास रूपये डाक खर्च अतिरिक्त) बरगद के नाम ड्राफ्ट द्वारा इस पते पर भेजें। सेन्टर आफ फोटोजर्नलिज्म एण्ड विजुअल कम्युनिकेशन डेलीगेसी परिसर इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद-२११००२ e-mail: bargad@rediffmail.com प्रोफेसर नामवर सिंह को कौन नहीं जानता। उनकी इलाहाबाद की कुछ समृतियां, इस पत्रिका के पहले वर्ष के तीसरे अंक के सौजन्य से हैं।)

हिन्दी का सबसे शक्तिशाली केन्द्र है इलाहाबाद - प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह
हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में प्रो. नामवर सिंह एक लब्ध प्रतिष्ठित नाम है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के संस्थापक व अध्यक्ष रहे नामवर सिंह पिछले पांच दशकों से भी अधिक समय से हिन्दी की सत्ता पर आलोचक के रूप में काबिज हैं। 'छायावाद', 'कविता के नये प्रतिमान', 'कहानी : नयी कहानी', 'इतिहास और आलोचना', तथा 'दूसरी परम्परा की खोज' जैसी कृतियों को देने वाले नामवर सिंह का इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से गहरा रिश्ता रहा है। पिछले दिनों जब हमने स्मृतियां सहेजने का उनसे आग्रह किया तो वे थोड़ी देर तक तो कहीं खो से गये और फिर बोले:

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से जुड़ना मेरे जीवन की महत्वपूर्ण घटना सा रहा है। बात १९४७
के आस-पास की होगी। मेरे मित्र महेन्द्र प्रताप जी बनारस से इण्टर पास करने के बाद बी.ए. करने के लिए विश्वविद्यालय में आये थे। उन्हीं दिनों प्रसंगवश मैं इलाहाबाद आया और प्रयाग में उतरकर सीधे उनके पास के.पी.यू.सी. छात्रावास पहुंचा। वहीं ठहरा भी। एक दिन उन्होंने कहा कि आज डा. राम कुमार वर्मा की क्लास है, मेरे साथ चलो। विश्वविद्यालय की झलक भी मिल जायेगी और वर्मा जी का व्याख्यान भी सुनने को मिलेगा। मैं डा. राम कुमार को कवि के रूप में जानता था। विश्वविद्यालय में टाई-सूट में अध्यापक के रूप में उनकी तस्वीर मेरे लिए नयी थी। इसी तरह महेन्द्र जी के चलते मेरी धर्मवीर भारती, गोपेश, गिरधर गोपाल और विजय देव नारायण साही से मुलाकात हुई। वे एम.ए. करने तक के.पी.यू.सी. छात्रावास में रहते रहे और मैं यहां आता रहा। उन्होंने ही मुझे सर्वेश्वर दयाल, अजित कुमार और ओंकार नाथ श्रीवास्तव से मिलवाया।

मैं यह भी बता दूं कि महेन्द्र प्रताप जी बहुत अच्छे गीतकार थे और सस्वर पाठ करते थे। यहां के बाद वे मुरादाबाद स्थित के.जी. कालेज में अध्यापक हो गये। रिटायर होने के बाद वे मुरादाबाद में बस गये और वहीं उनका देहावसान हो गया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से जुड़ाव तब और बढ़ा जब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय आये। शांति निकेतन में रहते हुए ही आचार्य द्विवेदी का सम्बन्ध धीरेन्द्र वर्मा, राम कुमार जी व उदय नारायण तिवारी से हो गया था। यही वजह थी कि उनके काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आते ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग से रिश्ते गहरे हो गये। उन दिनों हमारे यहां श्री कृष्ण राय व छैल बिहारी लाल गुप्त 'राकेश' अध्यापक थे, जिन्होंने पी एच डी व डी फिल इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया था। मैं वहां अध्यापक हुआ तो उस समय दोनों विश्वविद्यालयों का सम्बन्ध प्रगाढ़ता के चरम पर था। मेरे आने-जाने का सिलसिला अध्यापक के रूप में भी शुरू हुआ। यह क्रम साहित्यिक समारोहों व संगोष्ठियों में भी जारी रहा। उन्हीं दिनों मार्कण्डेय, दुष्यंत व कमलेश्वर से जुड़ा। ये लोग उन दिनों छात्र थे, तब प्रलेस की गोष्ठियों में आते थे। तब ये लोग छात्रावास में रहते थे। मैं ठहरता श्रीकृष्ण दास के यहां था, लेकिन इनसे मिलने गंगा नाथ झा छात्रावास जाता था।

याद आता है कि यूपी कालेज बनारस के मेरे सहपाठी भी यहां पढ़ने आये। वे हिन्दू हास्टल में रहते थे। मैं वहां जाता था। यहां मार्कण्डेय सिंह रहते थे, जो बाद में दिल्ली के ले.गवर्नर हुए। यहीं डा. ईश्वरी प्रसाद के शिष्य रघुबीर सिंह रहते थे, जो बाद में गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग के अध्यक्ष हुए। मेरा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से शैक्षिक सम्बन्ध तब और बढ़ा, जब प्रो. रघवंश विभागाध्यक्ष हुए। फिर डा. जगदीश गुप्त और प्रो. रामस्वरूप चतुर्वेदी के समय में यह सम्बन्ध और भी प्रगाढ़ हुआ। मैं पहले जोधपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग का अध्यक्ष बना और फिर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग का। उन दिनों मैं यहां बहुत आया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने यहां के हिन्दी विभाग की विशेष सहायता के लिए जो कमेटी बनायी, उसमें भी मैं था और मैंने इसकी गौरवशाली परम्परा को ध्यान मेंरखते हुए अनुदान दिलवाया। मुझे गर्व है कि यहां की प्रतिष्ठित निराला व्याख्यानमाला में मुझे भी व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया।

वर्तमान में प्रो. सत्य प्रकाश मिश्र के अध्यक्ष होने के बाद मेरे और हिन्दी विभाग के बीच के सम्बन्धों में और भी प्रगाढ़ता आयी है। वे संयोग से ऎसे समय विभागाध्यक्ष हुए हैं, जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय को केन्द्रीय दर्जा मिल गया है। सबसे अच्छी बात है कि प्रो. मिश्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं और माध्यम पत्रिका का सम्पादन कर रहे हैं। देखा जाये तो वे हिन्दी विभाग, भारतीय हिन्दी परिषद और हिन्दी साहित्य सम्मेलन जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं के सूत्रधार की भूमिका में हैं। हिन्दी का सबसे शक्तिशाली केन्द्र इलाहाबाद है। इस कारण हम सबकी आकांक्षयें व आशायें इस केन्द्र से हैं। हम चाहते हैं कि इस बात का अहसास इस विश्वविद्यालय को भी हो कि यहां का हिन्दी विभाग कोई छोटी चीज नहीं है और उपेक्षणीय तो बिलकुल भी नहीं। हिन्दी संसार को इस विभाग की केन्द्रीयता का अहसास होना चाहिये। हम सब की आंखे इस पर लगी हैं।

Tuesday, July 24, 2007

सुरों को जीतने वाला - सुरजीत चटर्जी

(आपको, इस लेख को कॉपी करने, बांटने, संशोधन करने अथवा वीकिपीडिया पर रखने की स्वतंत्रता है)

सुरजीत चटर्जी, एक जाने-माने पियानो वादक हैं। १९५० के दशक में इलाहाबाद में जन्में - भारत में मित्रों के बीच दुलाल और अमेरिका में शुरा के नाम से जाने जाते हैं। उनके पिता वकील और मां सगींत प्रेमी थीं। उन्हीं से संगीत की पहली शिक्षा मिली; उन्हीं की प्रेरणा से पियानो सीखना प्रारम्भ किया।

सुरजीत अपने इलाहाबाद के घर में

अपनी प्रारम्भिक शिक्षा इलाहाबाद के संत जोसेफ स्कूल से पूरी की और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक डिग्री लेने के पश्चात, वे दिल्ली स्कूल ऑफ म्युजिक (Delhi School of Music) चले गये। वहीं से, रूस सरकार के द्वारा, छात्रवृत्ति पर, मॉस्को कंजरवेटरी (Moscow Conservatory) में पियानो की संगीत शिक्षा प्राप्त करने गये। ११ साल तक वहां पियानो की शिक्षा प्राप्त कर वे अमेरिका चले गये और वहीं के नागरिक बन गये।


१० साल तक, कैलीफोर्निया, पासाडेना कंजरवेटरी आफ म्युजिक (Pasadena Conservatory of Music) एलऐ स्कूल आफ म्युजिक एण्ड द आर्ट (LA School of Music and the Arts) में संगीत शिक्षक एवं परामर्शदाता के रूप में कार्य किया। वे इस समय, हेस्पेरिया यूनीफाइड स्कूल डिस्ट्रिक्ट (Hesperia Unified School District) में संगीत के प्रोफेसर हैं।

१२ मई २००७ को सुरजीत के विद्यार्थियों के द्वारा कैलीफोर्निया में संगीत संध्या का आयोजन किया गया। प्रोग्राम के बाद अपने विद्यार्थियों के साथ सुरजीत

सुरजीत का पियानो वादन अपने आप में अनूठा है। वे पियानो पर संगीत के हर सुर निकालने में माहिर हैं। पियानो पर दौड़ती हुयी उनकी उंगलियां, मानो मखमली हों। वे पाश्चात्य संगीत में माहिर हैं पर अब उनकी संगीत साधना अपना पूरा चक्र पूरा कर रही है। बचपन में इलाहाबाद से शुरू हुआ पाश्चात्य संगीत का यह सफर, अमेरिका में जाकर वापस भारतीय संगीत में लौट रहा है।

यह वह सुरजीत हैं जो कि हमेशा पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत बजाना पसन्द करते थे। १५ अगस्त १९६९ पर आयोजित समारोह में पियानो पर पाश्चात्य शास्त्रीय वादन के बाद जब उनसे हिन्दी गाने या फिर कुछ हल्का फुल्का बजाने का अनुरोध किया गया तो बहुत आग्रह के बाद डाक्टर 'जिवागो फिल्म' से 'लारास् थीम' सुनाने की कृपा की।

सुरजीत अब हिन्दी गानों को सुनना और बजाना पसन्द करते हैं और खामोशी फिल्म के 'हमने देखी है उन आंखों में महकती खुशबू, हांथ से छू कर इसे रिश्तों का इलजाम न दो' गाने को अपने जीवन का अनुभव ... नहीं, नहीं अपने जीवन का निचोड़ मानते हैं। आप भी इस गाने को, उनसे पियानो पर सुनिये। उनके पियानो वादन के पहले, इसमें इस गाने की दो पंक्तियां भी हैं।

सुनने के चिन्ह ► तथा बन्द करने के लिये चिन्ह ।। पर चटका लगायें।


Hamne Dekhee Hai P...

आप उनके द्वारा बजाये गये पियानो पर परिणीता फिल्म का, 'सूना सूना मन का आंगन, ढूढ़े पायल की छन-छन, सूनी सूनी मन की सरगम, ढूढ़े गीत तेरे हमदम' भी सुन सकते हैं। इसमें भी पहले, इस फिल्म के गाने की दो पंक्तियां हैं।

Soona Man Ka Aanga...

सुरजीत के द्वारा पियानो पर बजाई गयी हिन्दी गानों के धुनों की सीडी, आपको जल्द ही बाजार में मिल सकेगी।

Hailing from a musical family in Allahabad, India, Surojeet (Shura) Chatterji had his first lessons with Naju Shapooyee and later with Hosie Palamkot at the Delhi School of Music. After graduating with honours from the Royal School of Music, London, he became the first Indian musician to be the recipient of a full scholarship from the USSR Government to study at the reputed Moscow Conservatory. He studied there for 11 years under Professor Erena Somordinova and Rudolf Kerer, masters who trace their instructional lineage all the way to Ludwig Van Beethoven.

After having received the highest degree from his Alma Mater, Shura immigrated to Southern California, where he began serving on the faculty of the Pasadena Conservatory of Music, the LA School of Music and the Arts, and for 10 years as music consultant and master teacher to the faculty members of the Ambassador International Cultural Foundation. And since then till the present, Shura is tenured Professor under Hesperia Unified School District.

The amazing and soul stirring performances of Shura’s students and that of his own are to be attributed, as he says, to the meeting of his rich Indian heritage with the great Russian method of teaching – where the individual is persuaded to experience a total physical immersion into the instrument empowering the pianist to express in deepest tones his innermost poetic imaginations. The shoulders, the hands, the fingers, most intimately glide, massage, and blend the melody of the music enabling it to flow on the piano as it were emerging from out of a well trained human voice.

Shura has indeed come full circle from the passion and discipline of western music into the weaving and harmonizing of Indian Dhuns on the piano. Harmonizing as such is an alien and difficult concept to be applied to pure Indian classical music. However, when applied to simpler Indian Dhuns as exemplified by the ingenious abilities of music composers of Indian films, they become marvelous orchestral fusions of the west and the east. Such is what is to be found in piano arrangements of similar Dhuns performed by Shura.

Monday, June 25, 2007

अंतरजाल पर हिन्दी के बढ़ते कदम

चिट्ठाकार बंधुवों,
नमस्कार
हम हिन्दी चिट्ठों और पॉडकास्टों में आयी नयी प्रविष्टियों की सूचना आपके पास लाते हैं। यह अंतरजाल पर हिन्दी बढ़ाने का एक छोटा सा प्रयास है। हमारा प्रयत्न है कि हिन्दी के सारे चिट्ठों एवं पॉडकास्टों की नयी प्रविषटियों की सूचना आपके पास लायें। यदि किसी चिट्ठे या पॉडकास्ट की सूचना नहीं आ पा रही है, तो कृपया हमें सूचित करें।

हमने सारे चिट्ठों, वेबसाइटों का वर्गीकरण किया है। हिन्दी चिट्ठों के लिये यह कर पाना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि अधिकतर चिट्ठे आम विषय पर हैं न कि किसी खास विषय पर। चिट्ठों का वर्गीकरण करते समय यह प्रयत्न किया गया है कि चिट्ठे उस श्रेणी में रखे जांय, जिस विषय पर मुख्यतः उस चिट्ठे पर चिट्ठियां पोस्ट होती हैं। आशा है कि यह कदम, हिन्दी चिट्ठों के विशेषीकरण में सहायक होगा।

हमने निम्न श्रेणियां बनायी हैं।
  1. पॉडकास्ट
  2. विज्ञान, तकनीक और कंप्यूटर
  3. निवेश, आर्थिक, व्यापार, और बजार
  4. धर्म
  5. फिल्म, टीवी, रेडियो और मीडिया
  6. हास्य, मनोरंजन, कार्टून, कॉमिक्स
  7. चित्र
  8. कविता, गीत शेर शायरी, गाने
  9. सुप्त चिट्ठे
  10. पत्रिकायें और पोर्टल
  11. चिट्ठों पर प्रविष्टियों की सूचना देने वाली अन्य वेबसाइट
  12. इंटरनेट पर रचनायें
  13. समाचार और सूचना देने वाली वेबसाइट
  14. वयस्क
  15. विविध चिट्ठे और वेबसाइट, जो उपर किसी श्रेणी में नहीं आती हैं
इस तरह के वर्गीकरण में गलती होने की संभावना है। यदि आपका चिट्ठा या वेबसाइट किसी गलत श्रेणी में रख दिया गया हो तो हमें सूचित करें ताकि उसकी श्रेणी ठीक की जा सके। यदि आपको लगता है कि कोई और श्रेणी भी होनी चाहिये तो कृपया लिखें। लिखते समय कम से कम तीन या चार चिट्ठों के नाम का सुझाव भी दें जो उस श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

यह कार्य करते समय निम्न बातें भी सामने आयीः
  • कुछ चिट्टों ने अपना नाम बदल लिये हैं। यदी आप आगे कभी अपने चिट्ठे का नाम बदलते हैं तो कृपया सूचित करें ताकि सही नाम दिखाया जा सके।
  • कुछ चिट्ठों पर नयी प्रविष्टियां नहीं हो रहीं हैं। हमने उन्हें 'सुप्त चिट्ठे' की श्रेणी में डाल दिया है। उनकी फीड भी हमारे प्रोग्राम से हटा दी गयी है। यदी आप पुनः लिखना आरम्भ करते हों तो कृपया सूचित करें ताकि आपकी प्रविष्टियों की सूचना दी जा सके।
  • कुछ चिट्ठे सार्वजनिक नहीं रहे। वे केवल निमंत्रण के द्वारा पढ़े जा सकते हैं। ऐसे चिट्ठों के नाम सूची से और फीड प्रोग्राम से हटा दी गयी है। यदि आप कभी अपना चिट्ठा सार्वजनिक करते हैं तो कृपया सूचित करें ताकि आपकी प्रविष्टियों की सूचना दी जा सके।
अंतरजाल पर हिन्दी के कदम रुकेंगे नहीं, बढ़ते रहेंगे - ऐसी आशा, ऐसी कामना के साथ,
आपके सुझावों के इंतजार में,
संपादक

Saturday, June 23, 2007

वयस्क

अंतरजाल पर हिन्दी के बढ़ते कदम
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  2. विज्ञान, तकनीक और कंप्यूटर
  3. निवेश, आर्थिक, व्यापार, और बजार
  4. सलाह और सीखने के लिये
  5. धर्म
  6. फिल्म, टीवी, रेडियो और मीडिया
  7. हास्य, मनोरंजन, कार्टून, कॉमिक्स
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  1. DHAI AKHAR
  2. गंदी लड़की
  3. गालियों से परहेज कैसा???
  4. चंडूखाना
  5. बाज़ार
  6. बजार पर अवैध अतिक्रमण
  7. भड़ास
  8. मोहल्ला
  9. सेक्स क्या
  10. हंगामा है क्यूं बरपा,
  11. हाशिया

हास्य, मनोरंजन, कार्टून, कॉमिक्स

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श्रेणियां

  1. पॉडकास्ट
  2. विज्ञान, तकनीक और कंप्यूटर
  3. निवेश, आर्थिक, व्यापार, और बजार
  4. सलाह और सीखने के लिये
  5. धर्म
  6. फिल्म, टीवी, रेडियो और मीडिया
  7. हास्य, मनोरंजन, कार्टून, कॉमिक्स
  8. चित्र
  9. कविता, गीत शेर शायरी, गाने
  10. सुप्त चिट्ठे
  11. पत्रिकायें और पोर्टल
  12. चिट्ठों पर प्रविष्टियों की सूचना देने वाली अन्य वेबसाइट
  13. इंटरनेट पर रचनायें
  14. समाचार और सूचना देने वाली वेबसाइट
  15. वयस्क
  16. विविध चिट्ठे और वेबसाइट, जो उपर किसी श्रेणी में नहीं आती हैं

यह श्रेणियां इस बात पर तय की गयी हैं कि उस चिट्ठे में मुख्यतः किस तरह की सूचना रहती है। यदि आपका चिट्ठा किसी गलत श्रेणी में है तो हमें सूचित करेंं ताकि उसे ठीक किया जा सके।


इस पेज पर हास्य, मनोरंजन, कार्टून, कॉमिक्स से संबन्धित चिट्ठों की सूची है।


  1. ナントカ考
  2.  Comic World
  3. Hindi Jokes
  4. Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून
  5. kstrokes
  6. आपके लिये जिन्दगी का एक दिन और सही
  7. इंडिया कॉमेडी INDIA Comedy
  8. चक्रधर की चकल्लस
  9. देसीटून्स़
  10. फ़ुरसतिया टाईम्स
  11. मज़ेदार फ़िल्मे/Funny Videos
  12. मजेदार समाचार
  13. लतीफे
  14. लतीफे
  15. सौम्य वचन
  16. हँसते रहो Hanste Raho
  17. हसगुल्ले
  18. हिमांशु की दुनिया

इंटरनेट पर रचनायें

अंतरजाल पर हिन्दी के बढ़ते कदम
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  2. विज्ञान, तकनीक और कंप्यूटर
  3. निवेश, आर्थिक, व्यापार, और बजार
  4. सलाह और सीखने के लिये
  5. धर्म
  6. फिल्म, टीवी, रेडियो, संगीत, और मीडिया
  7. हास्य, मनोरंजन, कार्टून, कॉमिक्स
  8. चित्र
  9. कविता, गीत शेर शायरी, गाने
  10. इंटरनेट पर रचनायें
  11. विविध चिट्ठे और वेबसाइट, जो उपर किसी श्रेणी में नहीं आती हैं
  12. पत्रिकायें और पोर्टल
  13. वयस्क
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  15. समाचार और सूचना देने वाली वेबसाइट

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इस पेज पर इंटरनेट पर हिन्दी के रचनाओं की सूची है।

  1. Quran Hindi
  2. उपन्यास-शून्य-Hindi online suspense thriller novel
  3. मेरी कलम से
  4. मुंशी प्रेम चन्द्र की रचनायें
  5. राग दरबारी
  6. श्री राम चरित मानस

Thursday, June 21, 2007

धर्म, अध्यात्म, साधना

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श्रेणियां

  1. पॉडकास्ट
  2. विज्ञान, तकनीक, कंप्यूटर और कानून
  3. निवेश, आर्थिक, व्यापार, बजार, और मैनेजमॅन्ट
  4. सलाह और सीखने के लिये
  5. धर्म, अध्यात्म, साधना
  6. फिल्म, नाटक, टीवी, रेडियो और मीडिया
  7. हास्य, मनोरंजन, कार्टून, कॉमिक्स
  8. चित्र
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  10. इंटरनेट पर रचनायें
  11. विविध चिट्ठे और वेबसाइट, जो उपर किसी श्रेणी में नहीं आती हैं
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यहां पर धर्म संबन्धी सूचना देने वाले चिट्ठों की सूची है।
  1. GURU VATIKA SE CHUNE PHOOL
  2. Hindi Blogs of Vedanta Mission
  3. My Vision
  4. Noori kiran { नूरी किरण {Islam- the Holy Religion }
  5. prayer - prathana
  6. Sri Godham Mahatrith
  7. अवलोकन - Introspection
  8. आत्म-चिंतन
  9. धर्म-दर्शन
  10. धर्म यात्रा
  11. निशांत का हिंदीज़ेन ब्लॉग - सर्वश्रेष्ठ नैतिक कथाएँ, प्रेरक प्रसंग, संस्मरण, और लेख
  12. बुद्द-वाणी
  13. रामरस
  14. वाल्मीकि रामायण
  15. सुख सागर से
  16. सूर्य आत्मा जगतस्थुषश्च
  17. श्रीमद्भगवद्गीता

फिल्म, नाटक, टीवी, रेडियो, संगीत, और मीडिया

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  3. निवेश, आर्थिक, व्यापार, और बजार
  4. सलाह और सीखने के लिये
  5. धर्म, अध्यात्म, और साधना
  6. फिल्म, टीवी, रेडियो और मीडिया
  7. हास्य, मनोरंजन, कार्टून, कॉमिक्स
  8. चित्र
  9. कविता, गीत शेर शायरी, गाने
  10. सुप्त चिट्ठे
  11. पत्रिकायें और पोर्टल
  12. चिट्ठों पर प्रविष्टियों की सूचना देने वाली वेबसाइट
  13. इंटरनेट पर रचनायें
  14. समाचार और सूचना देने वाली वेबसाइट
  15. वयस्क
  16. विविध चिट्ठे और वेबसाइट, जो उपर किसी श्रेणी में नहीं आती हैं

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यहां पर फिल्म, टीवी, रेडियो और मीडिया संबन्धी सूचना देने वाले चिट्ठों की सूची है।
  1. A Lyrics Diary
  2. chavanni chap
  3. cinema - सिलेमा
  4. Cine Manthan: Chrning Cinema
  5. Director's Desk
  6. Hindi TV Media
  7. MEDIAJANTANTRA
  8. Media Mantra
  9. radionama
  10. इंडियन बाइस्कोप
  11. एहसास: कभी आँसू, कभी ख़ु‌शबू, कभी नग़मा 
  12. गीतों की महफिल
  13. गोरखपुर फ़िल्म फ़ेस्टिवल
  14. जन्नत टॉकिज: जिंदगी = सिनेमा, रंगमंच और घुमक्कडी
  15. तेरे सुर और मेरे गीत: गीत संगीत को जानने का प्रयास 
  16. निंदा पुराण
  17. रेडियोनामा  
  18. वाह मीडिया! हिंदी ब्लॉग by Balendu Sharma Dadhich
  19. यायावर की फिल्मी बातें
  20. यूनूस खान का हिन्दी बलॉग: रेडियो वाणी
  21. हिन्दी टेलीभिजन संग्रह

विज्ञान, तकनीक, कंप्यूटर, चिकित्सा, पर्यावरण, और कानून

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  10. पत्रिकायें और पोर्टल
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इस पेज पर विज्ञान, तकनीक, कंप्यूटर, चिकित्सा, पर्यावरण, और कानून से संबन्धित चिट्ठों की सूची है।


  1. Bridging Digital divide टेक्नौलजी अपनी भाषा में
  2. computer mania
  3. Control Panel कंट्रोल पैनल
  4. drdhabhai
  5. Dudhwa Live
  6. Heal and Health
  7. Heal & Health 
  8. Hindi 2 Tech तकनीक हिन्दी में 
  9. Hindi Tech Guru 
  10. Hindi Blog tips
  11. INTERNET and PCRELATED TIPS
  12. kort-kachahri
  13. JK Health Care
  14. mera samast मेरा समस्त
  15. mera samast 1
  16. Nitin Hindustani ka Blog
  17. Prabhakar's page
  18. Rajasthan Lawyer's Blog
  19. Raviratlami Ka Hindi Blog
  20. Sahi Baat सही बात - सूचना, विज्ञान और प्रोद्योगिकी समाचारों का हिंदी भाषी ब्लॉग
  21. Science Activities In Hindi विज्ञान गतिविधियां हिंदी में  
  22. Science Bloggers' Association
  23. SEO Tips and Tactics - Hindi Version
  24. Shreesh Computer World 
  25. Tech Education Hub
  26. Tech Patrika
  27. technik ki duniya!technology in the world!
  28. The Light of Ayurved 
  29. Time Traveller: a blog dedicated to Science and Society
  30. TSALIIM: विज्ञान केन्द्रित विचारों और वैज्ञानिक पद्धतियों से परिचित कराने का एक विनम्र प्रयास
  31. Voyager
  32. अदालत: एक ऐसी जगह, जहाँ शायद कोई बार-बार जाना ना चाहे
  33. अंकुर गुप्ता का हिन्दी ब्लाग
  34. अंतरजाल पे मुफ्त डेस्कटॉप यंत्र
  35. अंतरिक्ष
  36. आयुषवेद
  37. इंडिया वाटर पोर्टल
  38. ई-पंडित
  39. उन्मुक्त
  40. कंप्यूटर को जाने और समझें हिन्दी में
  41. कंप्यूटर समस्या समाधान व नई तकनीक
  42. कल की दुनिया
  43. क्लाइमेट वाच
  44. क्यों और कैसे विज्ञान में 
  45. कुदरतनाम
  46. कानूनी ज्ञान 
  47. कॉर्बेट न्यूज़
  48. गूगल हिन्दी में
  49. गुनहगार
  50. चिट्ठाकारी गुरु
  51. जूनियर कौंसिल
  52. तकनीकी चिट्ठा
  53. तकनीकी दस्तक
  54. तकनीकी संवाद
  55. तीसरा खंबा -विधि व न्‍याय प्रणाली को समर्पित प्रथम जालस्थान
  56. दर्पण
  57. ना जादू ना टोना
  58. नुक्ताचीनी
  59. नैनोविज्ञान - नैनोविज्ञान तथा नैनोटेकनोलॉजी के बारे में कुछ रोचक जानकारियाँ…
  60. नौ दो ग्यारह
  61. प्रगत भारत
  62. प्रतिभास
  63. पर्यानाद्
  64. पार्थवी
  65. ब्लॉग बुद्धि
  66. बूझो
  67. भारत का वैज्ञानिक चिन्तन
  68. मीडिया डाक्टर
  69. रिमिझिम कंप्यूटर बलॉग
  70. लेख
  71. विधि चर्चा
  72. विज्ञान के आंगन में
  73. विज्ञान सबके लिये
  74. विज्ञान विश्व
  75. स्पंदन - डाक्टर की डेस्क से
  76. स्वास्थ्य-सबके लिए
  77. साईब्लाग [sciblog]
  78. सीखिये और सिखाइए
  79. सुजलाम्
  80. सुजलाम - इधर उधर से
  81. सेलगुरू
  82. सेहतनामा
  83. सौर मंडल
  84. हमारा पर्यावरण 
  85. हिंदी टूल बार पिटारा
  86. हिन्दी टूल हिन्दी गाथा
  87. होम्‍योपैथी

मेरे और इस वेब साइट के बारे में

यह सेवा, न्यास द्वारा, हिन्दी देवनागरी (लिपि) को बढ़ावा देने के लिये शुरू की गयी है। मैं इसका सम्पादक हूं। आपके विचारों और सुझावों का स्वागत है। हम और भी बहुत कुछ करना चाहते हैं पर यह सब धीरे धीरे और इस पहले कदम की प्रतिक्रिया के बाद।